अभावों को ठेंगा दिखा, बेटियों ने लिखी सफलता की कहानी
अभावों को ठेंगा दिखा, बेटियों ने लिखी सफलता की कहानी
- नेट व जेआरएफ का परिणाम घोषित होते ही लगने लगा बधाई देने वालों का तांंता
संवाद न्यूज एजेंसी
औरैया। अधिकतर लोग अभावों पर ठीकरा फोड़ अपनी राह बदल लेते हैं। यदि मन में संकल्प और इच्छा शक्ति हो तो अभावों की बेड़ियां तोड़ सफलता की कहानी लिखी जाती है। ऐसा ही जिले की बेटियों ने साबित कर किया है। नेट व जेआरएफ का परिणाम घोषित होने के बाद परीक्षार्थियों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। माता-पिता ने मुंह मीठा कर पीठ थपथपाई। वहीं घर पर बधाइयां देने वालों का तांता लग रहा है। सोशल मीडिया पर भी बधाइयों की बयार चल रही है।
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फोटो- 14एयूारपी-46- अर्पिता शुक्ला
माता-पिता के भरोसे से जागी इच्छा शक्ति ने दिलाई सफलता
- शहर के पुराने फफूंद रोड विधिचंद्र निवासी अधिवक्ता श्रीप्रकाश शुक्ला की बेटी अर्पिता शुक्ला ने हिंदी विषय में जूनियर रिर्सच फैलोसिप व सहायक प्रवक्ता परीक्षा में 99.95 प्रतिशत अंक अंक हासिल किए। इस प्रतियोगी परीक्षा में समान्य कैटागरी का कट ऑफ 99.64 प्रतिशत रहा। अर्पिता बतातीं हैं कि उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिंदी विषय में पोस्ट ग्रेजुएसन की है। कोविड काल के चलते उन्हें घर आना पड़ा। जिसके चलते वह कोचिंग का सहारा न ले सकीं। उन्होंने यू-ट्यूब व गोपाल इंटर कालेज की हिंदी प्रवक्ता मधू कुशवाहा की मदद से अपना अध्यन जारी रखा। पहली बार प्रतियोगिता में असफल होने से निराशा हाथ लगी थी। पिता श्रीप्रकाश शुक्ला व मां साधना शुक्ला ने उसका हौसला बढ़ाया और उस पर पूरा भरोसा जताया। दूसरे प्रयास में उसने सफलता को हासिल किया। अर्पिता का कहना है कि वह पीएचडी कर प्रवक्ता बनना चाहतीं हैं।
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फोटो-14ओयूआरपी-47- इति शिवहरे।
सफलता के पीछे शिक्षण कार्य व गुरू का रहा योगदान
- शहर के मोहल्ला खिड़की साहब राय निवासी व्यवसायी सुशील कुमार शिवहरे की बेटी इति शिवहरे ने अपने पहले ही प्रयास में 97.37 प्रतिशत अंक लाकर असिस्टेंट प्रोफेसर पद की परीक्षा में सफल रहीं। असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए समान्य वर्ग का कट ऑफ 97.18 रहा। इति बतातीं है कि उन्होंने सीएसजेएम विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य से पोस्ट ग्रजुऐशन की है। उन्हें कविताएं लिखने का भी शौक है। मौजूदा समय में वह एक निजी स्कूल में शिक्षण कार्य करतीं हैं। उनकी इस सफला में उनके प्रथम गुरु गोविंद द्विवेदी का अहम योगदान रहा। उन्होंने किसी भी प्रकार की कोई कोचिंग नहीं ली। शिक्षण कार्य करने से उनके ज्ञान में काफी बृद्धि हुई। जब भी उन्हें कोई समस्या रहती तो वह यू-ट्यूब या अपने गुरु का सहयोग लेतीं थी। कविताओं से भी उसकी हिंदी में काफी बदलाव आया है। पिता सुशील कुमार व मां संगीता शिवहरे ने भी उसको हमेशा प्रोत्साहित किया है।