डकैतों के नाम से जाने जाना वाला बीहड़ हकीमों के लिए हिमालय की तरह जीवनदायी था। इस बीहड़ में दुलर्भ जड़ी बूटियों का खजाना था। अब यह जड़ी बूटी विलुप्त होती जा रही हैं। यहां 271 जड़ी बूटियां होने का उल्लेख है।
गंभीर रोगों में रामबाण साबित होने वाली जड़ी-बूटियों के संरक्षण एवं संवर्धन की किसी को कोई परवाह नहीं है। बीहड़ में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियां जानकारी के अभाव में विलुप्त होती जा रही हैं। शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ाने में कारगर ‘चैमुखी गोखरू’ धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। दोमुखी गोखरू विलुप्त हो चुका है। गठिया-वात के सर्वाधिक रोगियों के उपचार में रामबाण साबित होने वाली औषधि ‘ख्यारी’ जड़ी-बूटी बारिश की कमी से खत्म होने की कगार पर है।
यह जड़ी-बूटी घुटनों के दर्द में बड़ी सहायक है। यह हल्दी वंश की एक प्रजाति है। इसके एक सप्ताह के लेपन मात्र से सम्बंधित रोगों में आराम मिल जाता है। बीहड़ क्षेत्र के बैद्य हर्षवर्धन बताते है कि पंचनद इलाके के इस घनघोर बीहड़ में छुपी लगभग दो सौ जड़ी-बूटियां जानकारी के अभाव में धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर आ चुकी हैं। इनकी खोज ने दूर-दराज से आने वाले वैद्य हकीम बीहड़ी वादियों की खाक छानने आते रहे हैं।
इंदिरा गांधी ने दुर्लभ जड़ी बूटी किताब का विमोचन किया था
बीहड़ में छुपी इन जड़ी बूटियों की महत्ता को लेकर आयुर्वेद चिकत्सा में पुस्तकें भी लिखी जा चुकी हैं। वृंदावन विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे स्व. रत्नाकर शास्त्री ने ‘भारत के प्राणाचार्य’ नामक पुस्तक में पंचनद इलाके में पाई जाने वाली 271 जड़ी-बूटियों का विस्तृत रूप से उपचारात्मक विधियों का विश्लेषण करते हुए इनके संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया था। बाद में इसी पुस्तक का दिल्ली के एक कार्यक्त्रस्म में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विमोचन भी किया था।
बीहड़ में पायी जाने वाली प्रमुख जड़ी-बूटियां
1. कोहर - चोट व मोच में सहायक।
2. बांझ ककोड़ा - वात, बयाद, जोड़ो के दर्द में सहायक।
3. हड़नोड़ - पुरानी चोट, फ्रैक्च में सहायक।
4. कुरियाकांधा - कमर व घुटनों के दर्द में सहायक।
5. सनेइया - सभी प्रकार की चोटों में सहायक।
6. रतनजोत - बवासीर में सहायक।