औरैया। करवाचौथ पर सुहागिन महिलाओं ने पूरे दिन उपवास रखकर देरशाम चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से जल ग्रहण किया और पूजन कर उनके दीर्घायु की कामना की। यही नहीं, इस अवसर पर महिलाओं ने सोलह शृंगार भी किए। त्यौहार मनाने के लिए जमकर आतिशबाजी की गई।
कार्तिक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवाचौथ मनाते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार सुहागिन महिलाएं इसे हर्षोउल्लास व धूमधाम से मनातीं हैं। महिलाओं ने पति की दीर्घायु के लिए पूरे दिन निर्जला व्रत रखा। देरशाम करीब महिलाओं ने उदित चंद्र को अर्घ्य देकर पूजा की और अपना व्रत तोड़ा। चंद्र उदय होते ही लोगों ने जमकर आतिशबाजी की। आकाश में लगभग एक घंटे तक आतिशबाजी मनोहर छटा बिखेरती रही। महिलाओं ने चंद्र को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों जल ग्रहणकर अपना उपवास तोड़ा।
करवाचौथ का कथानक
प्राचीन काल में सदानंद नामक ब्राम्हण था, उसके सात पुत्र व एक पुत्री थी। पुत्री का विवाह हुआ। पहले करवाचौथ को उसकी पुत्री मायके में थी। उसने व्रत रखा। सात भाइयों ने बहन को दिनभर भूखे देखा। शाम को वे बहन के कुम्हलाए चेहरे से द्रवित हो गए। एक भाई ने पेड़ पर चढ़कर दीपक दिखाकर बहन को चंद्रमा के नकली दर्शन कराए। अन्य भाइयों ने बहन से कहा कि देखो चांद निकल आया है। बहन दिए की लौ को चांद समझकर अर्घ्य देकर व्रत तोड़ बैठी। तभी ससुराल में उसके पति की हालात बिगड़ी और मौत हो गई। यह खबर सुनकर वह रोने लगी। ससुराल जाते वक्त रास्ते में एक ब्राम्हण ने उसे पति को पुर्नजीवित करने के लिए करवाचौथ का व्रत रखने की सलाह दी, इससे उसका पति पुर्नजीवित हो गया। तभी से सुहागिन स्त्रियां पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं।