पांच नदियों (जमुना,चंबल, सिंघ, पहुंज व क्वारी ) का संगम तीर्थराज पंचनद विश्व का एकमात्र ऐसा स्थल है, जहां एक कोस के व्यास में पांच नदियां मिलती हैं। कहते हैं कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पंचनद में स्नान करने से शरीर के सारे कृष्ट दूर हो जाते हैं। यहां पौराणिक काल में भी आध्यात्म का केंद्र रहा है।
पंचनद औरैया के ग्राम ततारपुर (जुहीखा), इटावा के कालेश्वर गढिय़ा, एवं जालौन के कन्चौसा के मध्य स्थित है । यहां पर महाभारत काल में पांडु पुत्र भीम ने जमुना चंबल के संगम पर भारेश्वर महादेव, जमुना क्वारी के संगम पर कलेश्वर महादेव एवं बाबा मकुंदवन की तपोभूमि व सिद्व काली मॉ का मंदिर है।
वहीं जुहीखा में जमुना नदी पार करके राजा कर्ण सिंह सेंगर ने माता कर्णवती देवी का मंदिर बनवाया था।
कालेश्वर गढ़िया से क्वारी नदी का पुल पार करके कंजौसा स्थित बाबा मकुंदवन की तपोस्थली है, यहां पर बाबा के चरणों की पूजा पान व बतासा से की जाती है। वहीं एक मंदिर में बाबा मकुंदवन की इष्टदेवी मां काली की सिद्व मूर्ति है, कहते हैं कि यहां मन्नत मांगने वाले की सभी मुरादें पूरी होती हैं। तुलसीदास ने एक माह इसी स्थान पर रुककर रामचरित मानस सुनाई थी।
अजीतमल निवासी राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पं. नर्मदा प्रसाद शास्त्री व यज्ञाचार्य पं. देवेश दीक्षित एवं पं. रामबहादुर शास्त्री भागवताचार्य ने बताया गया कि देवी भागवत एवं बाल्मीकि रामायण में उक्त स्थल को विश्व की सर्वश्रेष्ठ तपोभूमि बताया गया है ।
वीरेंद्र ने हेरीेटेज स्थल बनाने की उठाई थी मांग- अजीतमल (औरैया)। जुहीखा ग्राम के युवा समाजसेवी वीरेंद्र ने बीबीसी लंदन को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि ऐसा स्थल जहां संगम स्थित भालेश्वर मंदिर, पंचनद स्थित कालेश्वर महादेव मंदिर , कंजौसा सिंह बाबा मकुंदवन की तपोस्थली एवं माता कर्णवती मंदिर का मंदिर है।
इससे प्रभावित होकर कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने स्थलों पर आने जाने की सुविधा के लिए सिकरौड़ी, जुहीखा व क्वारी नदी पर कंचोसा में तीन पुलों का निर्माण करवाया, जिससे आज श्रद्धालु आसानी से मंदिर में पूजा अर्चन के लिए आते-जाते है, लेकिन स्थल के लिए आज तक सड़क व सुरक्षा व्यवस्था मुहैया नहीं हो सकी।
लायन सफारी की तर्ज पर हो विकास- अजीतमल पर्यावरणविद बीएस विश्नोई ने सांसद प्रोफेसर रामगोपाल यादव से मांग की है कि मुख्यमंत्री की लाइन सफारी की तर्ज पर जमुना चंबल के संगम भरेह में जल जीवों (मगर, घड़ियालों, 14 प्रजातियों के कछवा, डाल्फिन मछली) आदि हैं।
इसे भी इटावा की सफारी के तर्ज पर विकसित कराया जाए, जिससे विश्वभर के पर्यटक इस स्थल का दर्शन व आध्यात्मिक ज्ञान को समझ सकें । इससे विदेशी मुद्रा का अर्जन भी होगा।