एक दशक पहले मत्स्य विभाग के कामों में मछली पालन के साथ ही सिंघाड़ा उत्पादन भी शामिल था। उस दौर में शायद ही कोई तालाब शेष रहता हो जिसमें सिंघाड़े की बेल तैरती नजर न आती हो। राज्य सरकार के साल 2005 में सिंघाड़ा उत्पादन से नाता तोड़ लेने के बाद जिले में इस फसल की पैदावार भगवान भरोसे ही होकर रह गई है।
मत्स्य विभाग की डायरी में जिले की कुल 477 ग्राम सभाओं में 593 तालाब दर्ज हैं। विभाग की ओर से 262.296 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले कुल 414 तालाबों का पट्टा किया गया है। पिछले दो सालों में हुई कम बारिश का ही परिणाम है कि कुल पट्टाधारी तालाबों में बमुश्किल 20 फीसदी तालाब ही पानी की उपलब्धता के चलते आबाद हैं।
पिछले एक दशक पहले राज्य सरकार के सिंघाड़े को मत्स्य विभाग से हटा दिए जाने के फरमान के बाद जिले में सिंघाड़े की खेती पर व्यापक असर पड़ा है। मत्स्य विभाग से अलग हुई सिंघाड़े की फसल को अब तक न कृषि और न ही उद्यान विभाग से संबद्ध किया जा सका है। यही कारण है कि जिले में सिंघाड़ की फसल का निश्चित क्षेत्रफल के सरकारी आंकड़ों का कोई रिकार्ड नहीं हैं।
जिले में सिंघाड़े का निश्चित फसल उत्पादन क्षेत्र तय न होने से सिंघाड़े की फसल वक्त के साथ तालाबों से गुम होती जा रही है। इस फसल के पहले के पालनहार मत्स्य विभाग को भी पता नहीं हैं कि अब जिले में कितने पट्टाधारी तालाबों में इस फसल की पैदावार की जाती है।
दम तोड़ रहा व्यवसाय
एक जमाना था जब गांवों के सभी तालाबों में बेल डालकर सिंघाड़े की फसल की जाती थी। नियम परिवर्तन से बंद हुई सरकारी इमदाद और 80 फीसदी सूखे तालाबों ने पट्टेधारकों को सिंघाड़े की फसल से दूर कर रखा है। साल दर साल हो रही कम बारिश से पारंपरिक खेती में नुकसान पर सिंघाड़े की फसल को किसानों की अल्प कालीन आय का प्रमुख स्रोत के रूप में देखा जाता है। जिले में सूखे तालाब, सरकारी उदासीनता से यह व्यवसाय समय के साथ दम तोड़ता नजर आ रहा है।
पट्टा शुल्क में वृद्धि से निराशा
तालाबों के पट्टाधारक बनने को हर कोई जल्दी तैयार नहीं होता रहा है। तालाब पट्टों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के ही लोग इससे जुड़ते रहे हैं। पहले के सालों में जहां तीन सालों की औसत आय के आधार पर तालाबों के पट्टे किए जाते थे। वहीं उच्च न्यायालय के दखल के बाद परिवर्तित हुए नियमों के आज प्रति हेक्टेयर/साल तालाब का पट्टे का शुल्क 18000 रुपये ने भी जिले से सिघाड़े की मिठास कम की है।
सिघाड़े पालन का प्रावधान समाप्त किए जाने से मत्स्य विभाग से इसका कोई सरोकार नहीं हैं। हां इतना कहा जा सकता है कि समय परिर्वतन के साथ ही सिंघाड़ की फसल का दायरा जिले से कम होता जा रहा है।
बाबूलाल, मुख्य कार्यालय अधिकारी मत्स्य