दिबियापुर (औरैया)। शारदीय नवरात्र की अष्टमी व नवमी यानी रविवार व सोमवार को गहेसर स्थित मां महामाई मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ेगी। इसके चलते मंदिर में चाक चौबंद व्यवस्था की गई है। मंदिर में महामाई की मूर्ति के साथ ही इनके आसपास खड़ी मुद्रा में ज्वाला देवी एवं गमा देवी के साथ नौ देवियां विराजमान हैं। मंदिर की महिमा आल्हा खंड काव्य में भी मिलती है। मान्यता है कि यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की मन मांगी मुराद पूरी होती हैं।
किवदंती है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व सहार स्टेट के राजा सदन सिंह को स्वप्न आया कि गहेसर गांव के पास झाड़ियों में माता महामाई हैं। स्वप्न के आधार पर उस समय पिलुआ की झाड़ियों की राजा सदन सिंह ने सफाई कराई। यहां माता महामाई की मूर्ति निकली। राजा ने यहां मंदिर का निर्माण करा मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करा दी। आगे चलकर माता महामाई का मंदिर शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। तब से लेकर आज तक यहां आने वाले सभी श्रद्धालुओं की मन मांगी मुरादें पूरी होतीं हैं।
लोग बताते हैं कि प्रसिद्ध शक्तिपीठ महामाई दरबार में भक्त के रूप में आल्हा ऊदल भी आते थे। आल्हा खंड काव्य में भी मंदिर की महिमा का बखान किया गया है। महामाई मंदिर के पुजारी बताते हैं कि उनके पूर्वज इस मंदिर में पुजारी के रूप में रहे। आल्हा ऊदल कन्नौज से महोबा जाते समय मंदिर के बाहर से गुजरे मार्ग का इस्तेमाल करते थे। यहीं पर विश्राम भी किया करते थे।
प्रसिद्ध शक्तिपीठ महामाई की प्रसिद्धि इस कदर है कि कई जिलों के श्रद्धालु यहां प्रत्येक सोमवार एवं शुक्रवार को आते हैं। शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में नौ दिनों तक यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। नवरात्र के अंतिम दिन झंडे जवारे चढ़ाने वालों की भीड़ उमड़ती है। पुजारी का कहना है कि यहां श्रद्धापूर्वक शीश नवाने वाला आज तक खाली हाथ नहीं गया।