सामाजिक जिम्मेदारी हो या घर की मर्यादा आडंबरों को दर किनार कर महिलाओं ने अपनी जीवटता, मेहनत और आत्म विश्वास से न केवल अपना बल्कि अपने परिवार को समाज में मुकाम हासिल कराया है।
शिक्षा क्षेत्र हो या बंदिशों में जकड़ा समाज। हम होेंगे कामयाब एक दिन की सकारात्मक सोच के साथ उन्होंने सभी जगह अपनी दम का लोहा मनवाया।
महिला सामाख्या ने बनाया कारवां- महिलाओं को कमजोर समझने के समाज में फैले भ्रम को तोड़कर महिला सामाख्या की कंचन तिवारी ने महिलाआें को स्वावलंबी बनाने में महती भूमिका निभाई है।
कंचन ने महिला सामाख्या से जुड़कर न केवल गरीबी की चपेट में आए अपने परिवार को दो जून की रोटी की जुगाड़ बनाई। बल्कि अपने जैसी बेसहारा, अशिक्षित व गरीब 2000 महिलाओं को कुटीर उद्योग से जोड़कर उनके स्तर को ऊंचा उठाया।
बताती हैं कि महिला सामाख्या 1996 में जिले में आई थी, तब से वह संस्था से जुड़ी हैं। संस्था महिला जागरूकता, किशोरी स्वास्थ्य एवं शिक्षा के अलावा भैंस पालन, बकरी पालन, सामूहिक खेती, टेंट हाउस, बैग निर्माण, झोला निर्माण आदि रोजगाराें के माध्यम से महिलाआें को स्वावलंबी बनाने में योगदान दे रही है।
घूंघट छोड़ बलबूते पर बनी डायरेक्टर - सामाजिक जिम्मेदारी निभाकर महिलाओं ने भी विकास की इबारत लिखी है। अजीतमल के ग्राम ऐलचीनगर में बहू बनकर आई सुमन देवी प्रजापति ने सामाजिक कुरीतियों व परंपराओं से जकड़ी देहरी लांघ आज क्रय-विक्रय समिति में डायरेक्टर का मुकाम हासिल किया है।
बताती हैं कि जब वह अपना पीहर ग्राम जमौरा कानपुर देहात छोड़कर ससुराल में आई तो बीहड़ का यह गांव दस्युओं की शरण स्थली के रूप में जाना जाता था। पुरुषाें की बगैर मर्जी के घर की चौखट लांघना मुश्किल था। ऐसे में उन्होंने सामाजिक कुरीतियों व परंपराओं को सिरे से खारिज कर दिया।
गांव की अनपढ़ महिलाआें व बेटियों की न केवल समय-समय पर मदद की बल्कि अधिकारों के बारे में जागरूक किया। शुरुआत में उनकी राहों में रोड़े अटकाए गए।
वर्ष 2010 में क्षेत्र पंचायत चुनाव भी लड़ा, पर हार गई, लेकिन हौसलों की उड़ान पर ब्रेक नहीं लगने दिया। परिणाम स्वरूप 2012 में साधन सहकारी समिति अटसू का चुनाव लड़कर डायरेक्टर पद हासिल किया।
अगर इरादा पक्का तो आसान होती राह - दकियानूसी आडंबरों से परे श्रीमती विपिन त्रिपाठी ने अपने बलबूते पर क्षेत्र में एनजीओ के माध्यम से शिक्षा की मशाल जला रखी है।
अशिक्षित और गरीब महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाकर उनको हकों के प्रति जाग्रत कर रही हैं। आत्म विश्वास और कार्यों से आज समाज में श्रीमती त्रिपाठी ने समाज सेविका के रूप में पहचान बनाई है।