यमुना किनारे औरैया के मढ़ापुर से लेकर अजीतमल ब्लाक के बडेरा तक फैली बीहड़ भूमि को वन माफियाओं ने कोयला कर दिया है।
यह सब एक- दो दिन में नहीं हुआ बल्कि प्रशासन व सफेदपोश नेताओं की शह पर जंगल माफियाओं ने किया है। आज जंगलों से शीशम, खैर, गुगड़, सागौन, रैडस, छैकुट के पेड़ लगभग गायब से चुके हैं।
इस इलाके में हरी लकड़ी से कच्चा कोयला बनाने वाली कई अवैध भट्टियां चलती हैं। इन भट्टियों से बनने वाले कोयले की सप्लाई, दिल्ली, फिरोजाबाद के अलावा ईंट भट्टों पर होती है, जिससे अच्छे दाम बन जाते हैं। इसी लोभ के चलते आधा क्षेत्र वीरान हो गया है।
नियमों की मानें तो सामाजिक वानिकी क्षेत्र के 10 किलोमीटर दायरे में कोयला भट्टियों का संचालन नहीं हो सकता है। क्षेत्र के मुरादगंज, दलेलनगर, भीखेपुर समेत तमाम भट्टियां वानिकी क्षेत्र के अंदर ही गांवों की सीमा में धधक रही हैं।
2006 के बाद वन संपदा पर आई आफत...- मुरादगंज (औरैया)। 2006 से पहले बीहड़ों में डाकुओं के चलते वन संपदा सुरक्षित थी। कोई वन माफिया जंगल में घुसने का साहस नहीं जुटा पाता था।
इसके चलते पूरा क्षेत्र हरा भरा सा नजर आता था, लेकिन 2006 में जैसे ही जंगलों से दस्यु सरगनाओं का सफाया हुआ तो वन संपदा पर आफत आ गई।
वृक्ष धरा के आभूषण है। वैदिक काल में मानव वृक्षों में अपना निवास बनाते थे, किंतु भौतिकवादी युग में मानव वृक्षों को नष्ट करने पर आमादा हो गया है। यही पर्यावरण संकट का मूल कारण बना है। - कौशल किशोर पांडेय (समाजसेवी)
वन क्षेत्र का घटना मानव व पशु पक्षी के लिए घातक है। वन विभाग को चाहिए कि वह वनों की रक्षा करें तथा नए वृक्षों को लगातार जिम्मेदारी से रखें, तभी हरियाली संभव है। - डा. राजीव चौहान (जैव विविध कार्यक्रम विशेषज्ञ)
बीहड़ क्षेत्र में तेजी से घट रहे वृक्षों की प्रजातियों के बाबत बताया कि जैविक दबाव अधिक पड़ने तथा पेड़ पौधे को शुद्घ वातावरण न मिलने से वन क्षेत्र घट रहा है। लगातार वक्षों की कमी के लिए मानव व जानवर दोनों जिम्मेदार है। -मानिक चंद्र यादव (डीएफओ)