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बाणासुर कंघा तो जोकर बेच रहा चूरन चटनी

Fri, 23 Oct 2015 12:14 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला, औरैया
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इतिहास की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने वाले रामलीला कलाकार प्रशासन की उपेक्षित नजरों के चलते आज बदहाली का जीवन जीने को मजबूर हैं।
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हालत यह है कि मंच पर अपनी कला का लोहा मनवाने वाले यह कलाकार आज पेट की खातिर अपनी जिंदगी से लोहा ले रहे हैं। कोई कंघा बेच रहा है तो रास्ते में घूम-घूमकर चूरन चटनी बेचने को मजबूर हैं तो कोई पीसीओ खोलकर अपनी शान शौकत बरकरार किए हुए हैं। ऐसे में इनको अभी भी शासन-प्रशासन की निगेहबानी का इंतजार है।


जीवन के 50 बहुमूल्य साल रामलीला में किरदार निभाकर देने वाले कंचौसी बाजार निवासी महेश भयंकर बताते हैं कि रामलीला में ताड़का व बाणासुर का किरदार निभाते समय उनकी कला के आगे कोई टिक नहीं पाता था। उम्र के इस पड़ाव में आज भी लोग जब नहीं मानते हैं तो उनकी खातिर मंच पर जाकर एक-दो संवाद बोलना पड़ता है।
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हकीकत तो यह है कि अब इस कला से रूचि खत्म होने लगी है। पेट की आग ही कुछ ऐसी है कि तालियों से काम नहीं चलता। आज सड़क पर घूम-घूमकर कंघा, गैस लाइटर आदि समान बेचकर जैसे-तैसे अपना ही पेट भर पाते हैं।



कहते हैं कि बाणासुर का किरदार निभाते समय वह पूरी तरह से उसके रंग में रंग जाते थे। अब धीरे-धीरे सब गुजरे जमाने की बातें हो रही हैं।

 
यह स्थिति केवल एक ही कलाकार की नहीं है बल्कि रामलीला कार्यक्रम में लोगों को हंसाने का काम करने वाले छुन्ना वर्तमान में बेरोजगार हैं। इससे पहले चूरन चटनी बेचकर अपनी गुजर बसर कर लिया करते थे।


वहीं रावण का किरदार निभाने वाले उदय कुमार का कहना है कि रामलीला में किरदार निभाना, उनका शौक है। आज भी कभी-कभी कार्यक्रम मिलने पर रावण का किरदार निभाने जाता हूं, जबकि जीविका के लिए पीसीओ खोल लिया है। इसके अलावा अन्य साधन भी जुटाए हुए हैं।

 
उनका कहना है कि हम लोग इतिहास की सांस्कृतिक धरोहर को लोगों के सामने जीवंत प्रस्तुत करते हैं। बावजूद इसके प्रदेश सरकार को हमारी कला की परवाह ही नहीं है।


कहते हैं कला-कला होती है। फिर चाहे नाट्य अकादमी की हो या फिर फिल्मी कलाकार या रामलीला कलाकार सम्मान के सभी बराबर के हकदार होते हैं। ऐसे में सरकार को रामलीला के कलाकारों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कोई ठोस कदम उठाने चाहिए। नाट्य कला अकादमी के कलाकारों की तरह हम लोगों को भी सरकार से सुविधाएं मिलनी चाहिए।
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तंगहाली के चलते नहीं की शादी- जीवन के अर्थवादी युग में अब सिर्फ पैसे से ही काम चलता है। महेश कहते हैं कि गरीबी के चलते उन्होंने शादी नहीं की, क्योंकि परिवार होगा तो खर्चे भी होंगे। अब जहां खुद का पेट भरने को लाले हों तो ऐसे में परिवार की भूख मिटा पाना उनके वश की बात नहीं है।
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