कस्बे से 20 किलोमीटर दूर घने जंगल के मध्य यमुना और चंबल नदी के संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर का पौराणिक महत्व है।
यह मंदिर धार्मिक आस्था के चलते जप-तप और वैराग्य की तपोभूमि रही है। लोग मनौती पूरी होने के बाद मंदिर में भोले बाबा की पूजा-अर्चना करने अवश्य आते है। ऐसी मान्यता है कि पूजा के दौरान नदी के कान में मनौती मांगने पर अवश्य पूरी होती है।
भारेश्वर मंदिर का पुराणों व ग्रंथों में उल्लेख किया गया है। पंडित रामबाबू द्विवेदी बताते है कि नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूक ग्रंथ एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखे थे।
पांडवों ने अज्ञातवास के समय भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर शंकर भगवान की आराधना के लिए भीमसेन के माध्यम से बाबा भोले के विशाल लिंग की स्थापना कराई थी। द्रोपदी समेत पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान भारेश्वर महाराज की पूजा अर्चना की थी।
बीहड़ में बना यह मंदिर देखरेख के अभाव में भले ही पहचान खोता जा रहा है लेकिन मंदिर में आने वाले भक्तों की आस्था अभी भी डिगी नहीं है।
सेंगुन गांव निवासी पप्पू दीक्षित, शिवलखन दुबे व रामवीर बताते है कि यह मंदिर शेगनपुर, कैथौली, रमपुरा, बबाइन, गूंज, ततारपुर, बरबटपुर, कुंआ गांव के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली आदि प्रांतों से भक्त मुरादें लेकर आते है।
मंदिर के गर्भ में बैठकर पूजन करने से मन को शांति मिलती है। जप-तप और वैराग्य के लिए ऋषि मुनि और साधुओं का केंद्र रहा है।