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आदिवासी जनजाति के बच्चे भी जाएंगे अब स्कूल

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कोंच। खानाबदोश कहलाने बाली लौहापीट जनजाति के तमाम परिवार कोंच में दशकों से सड़कों के किनारे डेरा डाले हैं। जिनमें कुछ को कांशीराम शहरी आवास योजना के तहत घर भी मिल गये हैं लेकिन उनके परिवारों के बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा है। सेठ वृंदावन इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य ब्रजबल्लभ सिंह सेंगर ने एक अभिनव पहल कर इन परिवारों से संपर्क साधा और उनके बच्चों को स्कूलों में दाखिला कराने के लिये राजी कर लिया है। उनकी पहल पर दर्जन भर बच्चे स्कूल जाने की तैयारी में हैं, शनिवार को इनके परिवार स्कूल पहुंचे जहां उनके लिए किताबों आदि की व्यवस्था की गई है।
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आदिवासी जनजाति के परिवारों के जो बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से अब तक दूर थे, उन्हें भी अब शिक्षित करने की मुहिम में सेठ वृंदावन इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य ब्रजबल्लभ सिंह सेंगर को चांदनी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य सीताराम प्रजापति, शिक्षक संजय सिंघाल, कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की वार्डेन वंदना वर्मा का भी साथ मिल गया है। ये लोग उन परिवारों से मिले और बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये प्रेरित किया। इतना ही नहीं उनके मां-बाप को इस बात के लिए भी राजी किया कि उनके बच्चे नियमित विद्यालय जाएं जिसके लिए शासन और सरकार विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम संचालित कर रही है और सुविधाएं मुहैया करा रही है।

इन लोगों के समझाने पर ये परिवार अपने बच्चों भेजने को राजी हो गए। स्कूल जाने योग्य बालिकाएं जो कभी भी स्कूल नहीं गई उनको कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में ब्रिज कोर्स सहित अन्य शिक्षण सामग्री द्वारा पठन पाठन योग्य बनाया जाएगा। छोटे बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में दाखिला दिलाकर शासन से प्रदत्त ड्रेस, भोजन, जूता, स्वेटर, किताबों आदि की व्यवस्था कराई जा रही है।
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जो बच्चों को विद्यालय से उपलब्ध कराए जाएंगे। स्कूल जाने की बात सुन कर बच्चे फूले नहीं समा रहे हैं और नए सत्र में उनके दाखिले कराते हुए उनको चार सदस्य शिक्षकों की टोली उन्हें पढ़ाने के लिए तैयार है। अब वह बच्चे इसी सत्र से अपने पसंदीदा विद्यालय में पढने जा सकेंगे। उन्होंने आम लोगों का भी आह्वान किया है कि यदि समाज में इस तरह के और भी बच्चे हैं तो उनको अवगत कराएं जिससे कि उनका उचित विद्यालय में दाखिला कराया जा सके तभी स्कूल चलो अभियान कार्यक्रम की सार्थकता सिद्घ हो सकेगी।

आज जिन परिवारों के बच्चों को स्कूल जाने के लिये तैयार किया गया है उनमें एक परिवार सुमन का भी है। उसने भावुक होते हुए कहा कि उनके परिवार तीन पीढ़ियों से यहां स्थाई तौर पर बसे हैं लेकिन आज तक किसी ने उनके बच्चों के प्रति संवेदनाएं नहीं दिखाईं। पहली बार है कि कुछ लोग ऐसे निकल कर आये हैं जिन्होंने सुध ली और उनके बच्चों को भी पढ़ने के लिये न केवल प्रेरित किया बल्कि हर संभव मदद देने का भी भरोसा दिया। उसे खुशी है कि आगे चल कर उनके बच्चे भी पढ़ लिख कर बाबू साब बनेंगे।
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रंग लाई सेठ वृंदावन स्कूल के प्रधानाचार्य की पहल
अमर उजाला ब्यूरो
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