वही संयोग, वही नक्षत्र और वही तिथि। यमुना में पानी का उफान भी कुछ उसी तरह। कृष्ण जन्माष्टमी पर एक बार फिर सब वही संयोग बनने जा रहा है जो आज से 5200 साल पहले भगवान कृष्ण के जन्म पर बना था। हालांकि 58 साल पहले 1958 भी ऐसा संयोग बना था। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक ऐसा संयोग शुभ फल देने वाला है।
इस बार श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का पर्व अनूठा संयोग लेकर आ रहा है। जब माह, तिथि, वार और चंद्रमा की स्थिति वैसी ही बनी है, जैसी कृष्ण जन्म के समय थी। आचार्य आशुतोष अवस्थी बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र और वृष लग्न के चंद्रमा की स्थिति में हुआ था। ऐसा योग 58 साल पहले 1958 में भी बना था। मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी की रात रोहिणी नक्षत्र के आरंभ काल के संयोग में हुआ। केवल रोहिणी नक्षत्र की स्थिति में मामूली अंतर आया है।
इस बार जन्माष्टमी (25 अगस्त) के दिन सूर्योदय के साथ ही अष्टमी तिथि का आगमन हो रहा है। इसके साथ ही मध्य रात्रि रोहिणी नक्षत्र का भी संयोग रहेगा। उन्होंने बताया की रात 11:14 से रात 1:10 बजे तक वृष लग्न रहेगी। इसलिए रात 12 बजे जन्मोत्सव मनाना शुभ रहेगा। इसलिए यह सबसे फलदायक होगी। इसके अलावा कृष्ण जन्म के समय जिस तरह से यमुना के वेग का उल्लेख है। कुछ उसी तरह से इस बार भी यमुना का वेग बढ़ा है।
ऐसे करें पूजा-
सभी लोग इस दिन अलग-अलग तरीके से पूजा-पाठ करते हैं। लेकिन इस दिन तीन मंत्रों का जाप बहुत शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। सात अक्षरी, आठ अक्षरी और बारह अक्षरी मंत्र बोलने और जाप करने में बड़े सरल और मंगलकारी हैं। ये मंत्र ऊँ गोकुल नाथाय नम:, ऊँ नमो भगवते श्री गोविन्दाय और ऊँ गोवल्लभाय स्वाहा हैं। शास्त्रों में यह कृष्ण मंत्र भी प्रभावशाली माना गया है। इस मंत्र से भय और संकट दूर हो जाता है। ऊँ नमो भगवते तस्मै कृष्णायाकुण्ठमेधसे। सर्वव्याधिविनाशाय प्रभो माममृतं कृधि।