उरई। सालों बाद सत्ता में आई भाजपा ने परिसीमन का ऐसा ताना बाना बुना कि दिग्गजों के अरमानों पर तो मानो पानी सा फिर गया है। बीते पांच साल से कोई पत्नी तो कोई मां को पालिकाध्यक्षी की कुर्सी पर बैठाकर 2017 में दोबारा वापसी के सपने संजो रहा था। लेकिन जब परिसीमन सामने आया तो सभी सीटों पर फेरबदल हो गया। फेरबदल भी ऐसी कि पांच साल से दावेदारी कर रहे दिग्गज पिछले 24 घंटों में भी अपनी चुप्पी तोड़ने का नाम नहीं ले पा रहे हैं। वहीं इन दिग्गजों के करीबियों का कहना है कि ठीक भी है, कम से कम पांच साल तक के हिसाब किताब से तो नेता जी बच गए। बता दें कि इस बार नगर पालिका की चारों सीटों पर परिसीमन में तगड़ा फेरबदल हुुआ है। सालों से एक जैसी चली आ रही सीटों के आरक्षण में परिवर्तन होने से कई लड़कों की तलवारें वापस म्यान में चली गई हैं।
उरई नगर पालिका (सामान्य)
सबसे पहले बात करते हैं, उरई नगर पालिका की, तो इस सीट पर बसपा के लोकसभा प्रभारी विजय चौधरी की मां गिरजा चौधरी निवर्तमान पालिकाध्यक्ष रही हैं। विजय स्वयं अनुसूचित सीट पर 2000 से 2005 तक पालिकाध्यक्ष रहे हैं। इसके बाद उन्होंने 2012 में महिला सीट होने पर अपनी मां को पालिकाध्यक्षी दिलाई। इस बीच भले ही विजय कांग्रेस से 2014 में लोकसभा और 2017 में बसपा से विधायकी लड़े हो, लेकिन पालिका की बागडोर रही उन्हीं के हाथ और उन्हें पूरा भरोसा था कि परिसीमन ने कोई अधिक फेरबदल नहीं होगा, आखिर में वे फिर से चुनाव मैदान में होंगे। अब जब 24 साल बाद सीट सामान्य हुई है तो चौधरी परिवार को भी झटका लगा है।
कोंच नगर पालिका (अनुसूचित)
इसी तरह कोंच पालिका सीट पिछली मर्तबा पिछड़ी (ओबीसी) महिला थी, और इस पर छात्र नेता से राजनीति शुरू करने वाले विज्ञान विशारद ने सवर्ण होते हुए भी दांव खेला और अपनी पत्नी विनीता सिरौठिया को प्रमाणपत्र के साथ ओबीसी सीट से मैदान पर उतारा। निर्दलीय प्रत्याशी विनीता सिरौठिया ने जीत दर्ज की थी, जीत भले ही विनीता की रही हो लेकिन पूरे पांच साल तक उनके पति विज्ञान विशारद ही छाए रहे। इस बार भी विज्ञान लड़ाई का पूरा मन बना चुके थे। सूत्रों की मानें तो कभी भाजपा, कांग्रेस में रहे विज्ञान इस बार लड़ने के लिए बसपा का भी दामन थामने को तैयार थे लेकिन सीट अनुसूचित जाति के खाते में जाने से विज्ञान के भी सारे समीकरण गड़बड़ा गए हैं।
कालपी नगर पालिका ( महिला-अनुसूचित)
कालपी नगर पालिका की तो यह सीट 2012 में पिछड़ा वर्ग से थी और इस सीट पर जनता दल यू के प्रत्याशी को बसपा के कमर अहमद ने हराया था। कमर इससे पहले 2000 से 2005 तक भी इसी सीट से चेयरमैन रह चुके हैं। कमर ने बसपा से सपा का पाला बदला और इस बार 2017 के लिए भी पूरी तरह से कमर कसे थे, लेकिन जब परिसीमन आया तो सीट महिला अनुसूचित जाति की हो गई तो कमर के दरबार में सन्नाटा पसर गया। सिर्फ कमर ही नहीं बल्कि परिसीमन आने 24 घंटे बीतने के बाद भी किसी भी दल में कोई महिला प्रत्याशी ढूंढे नहीं मिल रहा है। हर दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं से पत्नियों और मां को आगे लाने की बात कहते नजर आ रहे हैं।
जालौन नगर पालिका (सामान्य)
जालौन सीट 2012 में ओबीसी थी, इस सीट पर गुलाब सिंह ने भाजपा प्रत्याशी को हराकर अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाया था। राजनैतिक परिवार से जु़ड़े गुलाब की मां जिला पंचायत सदस्य और पत्नी ग्राम प्रधान भी है। इसलिए गुलाब को पूरी उम्मीद थी कि 2017 में भी वे या तो परिवार का कोई न कोई सदस्य पालिकाध्यक्षी की दौड़ में जरूर शामिल होगा, लेकिन जब परिसीमन का जिन्न बाहर आया तो गुलाब खिल न सका और सीट सामान्य के खाते में चली गई। इस कारण उनके भी मैदान में उतरने की कोई संभावना नहीं बची। वहीं सीट सामान्य होने से भाजपा के दावेदार सबसे अधिक सक्रिय नजर आ रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि सामान्य सीट पर उन्हीं की जीत तय है।
-उरई, कोंच, कालपी और जालौन सीट पर आरक्षण की करवट
अमर उजाला ब्यूरो