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श्रीमद्भागवत कथा का रसपान अमृत के समान

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अजीतमल (औरैया)। कलियुग में जीव मात्र को मोक्ष का सबसे सुगम साधन श्रीमद्भागवत कथा का रसपान करना है लेकिन सिर्फ कथा में बैठने से ही नहीं अपितु श्रद्धाभाव से कथा के सार को अपने जीवन में उतारने वाला जीव ही मोक्ष का भागी होता है।
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मोहल्ला आजाद नगर में प्राथमिक विद्यालय के सामने चल रही कथा के दूसरे दिन ये विचार भागवताचार्य पं. अनुरूद्ध ने व्यक्त किए। उन्होंने भागवत कथा में गोकर्ण और धुंधकारी की कथा का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि आत्मदेव नाम के एक ब्राह्मण से धुन्वति नाम की कन्या से विवाह हुआ। संतान प्राप्ति के लिए आत्मदेव ने ऋषियों से प्रार्थना की तो ऋषियों ने उन्हें पत्नी को खिलाने के लिये एक फल दिया। मगर पत्नी ने फल स्वयं न खाकर गाय को खिला दिया। छल से अपनी बहन की बेटा ले आई, जिसका नाम धुंधकारी था। उधर गाय को भी बछड़ा हुआ, जिसके कान गाय की तरह और बाकी मानव था। इससे उसका नाम गोकर्ण हुआ।

धुंधकारी भोग विलास में अपना सब कुछ गंवा बैठा। अंत समय में मरकर वह प्रेत योनि में चला गया। उसकी मुक्ति के लिए गोकर्ण ने अपने गुरु से शिक्षा लेकर श्रीमद्भागवत कथा का पाठ किया लेकिन श्रीमद्भागवत कथा के पाठ के श्रवण से धुंधकारी को तो मोक्ष मिल गया, बाकी किसी को नहीं। तब उसके गुरु ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा को सिर्फ धुंधकारी ने ही ध्यान और भाव पूर्वक श्रवण किया था। इसलिए उसकी मुक्ति हो गई है। आचार्य ने बताया कि सच्चे मनभाव से जो श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करता है उसी को सद्गति मिलती हैं। श्रीमद्भागवत कथा की व्यवस्था में आयोजक संजय कुमार, चंद्र कुमार एवं अखिलेश कुमार अग्रवाल, नवीन गुप्ता, पीके गुप्ता आदि लगे हुए हैं।
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-मोहल्ला आजादनगर में कथा का दूसरा दिन
अमर उजाला ब्यूरो
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