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खुले में शौच की मजबूरी और पीने को नहीं है पानी

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उरई। हैरत की बात है कि जालौन से छात्र राजनीति शुरू करने वाले परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के अपने ही जिले का बस अड्डा बदहाल है। कोंच बस स्टैंड की स्थिति यह है कि बसें चलती कम डोलती ज्यादा दिखाई देती हैं। खड़ंजा जगह-जगह से टूट गया है। बारिश में तो जलभराव से बुरा हाल हो जाता है। शौचालय ऐसा है कि यात्री तो क्या जानवर तक उसमें जाने से परहेज करते हैं। यात्री प्रतीक्षालय तो है पर सुविधा के नाम पर टीन शेड से बंधे गर्म हवा फेंकते पंखे ही नजर आते हैं।
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शहर स्थित कोंच बस स्टैंड से प्रतिदिन 150 से 200 बसों का संचालन कानपुर, झांसी, दिल्ली, इलाहाबाद, बांदा, महोबा, चित्रकूट, लखनऊ, रायबरेली और मध्य प्रदेश के जिलों के लिए किया जाता है। जिसमें 51 बसें झांसी और लगभग इतनी ही बसें कानपुर रूट पर चलाई जा रही हैं। उरई राठ, बांदा रूट पर 20 बसें चलाई जा रही है। शेष बसें अन्य मार्गों पर चलाई जा रहीं है।

इनसे प्रतिदिन लगभग 6 लाख रुपये का राजस्व भी विभाग को मिल रहा है। बीते छह माह में कई बार रोडवेज बसों का किराया भी बढ़ाया जा चुका है लेकिन यात्री सुविधाएं बढ़ने की बजाए घटती जा रही है। सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक अपराजित श्रीवास्तव का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि बस अड्डे पर यात्री सुविधाओं का अभाव है। इस पर विचार चल रहा है। जल्द ही स्टैंड का काया कल्प करने की योजना बन रही है। इसके बाद यात्रियों को पानी से लेकर शौचालय तक की सारी सुविधाएं यहीं स्टैंड पर उपलब्ध होंगी, उन्हें भटकना नहीं पड़ेगा।
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25 रुपये प्रतिमाह के किराए पर चल रहा स्टैंड
जिले के मंत्री होने के बाद भी परिवहन निगम के पास अपनी कोई जमीन नहीं है। कोंच बस स्टैंड भी नगर पालिका की जमीन पर स्थित है, जिसका किराया लगभग 25 रुपये प्रतिमाह है। यही कारण है कि बस अड्डे की ओर किसी भी अधिकारी का कोई ध्यान नहीं है। सालों से स्टैंड खड़ंजा पर ही चल रहा है। खड़ंजा भी कई जगह धंस गया है। बीते दिनों हुई बारिश में जब स्टैंड तालाब सा नजर आने लगा और बसों पर चढ़ना किसी पहाड़ से कम नहीं हुआ तो आनन फानन में पालिका ने खड़ंजे पर मिट्टी डालकर अपने काम की इतिश्री कर ली।

खुले में मिल रही शौच की सुविधा
भले ही प्रदेश सरकार और प्रशासन खुले में शौच मुक्त अभियान चला रहा हो, लेकिन कोंच बस स्टैंड की स्थिति कुछ अलग हैं। यहां तो खुलेआम खुले में शौच को बढ़ावा दिया जा रहा है। कारण साफ है, सालों पहले बना पुरुष शौचालय गंदगी का अंबार होकर अब खंडहर में बदल गया है, महिला शौचालय तो कभी बनाया ही नहीं गया। कर्मचारियों के लिए बना शौचालय भी करीब दो साल से चोक है। पूछो तो जवाब मिलता है कि सफाई का कोई बजट ही नहीं है। लिहाजा स्टैंड की चहारदीवारी ही शौचालय का काम कर रही है। जबकि महिलाओं के पास इसका कोई विकल्प भी नहीं हैं।
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-ये है परिवहन मंत्री के बस अड्डे की कहानी
-टीन शेड से टंगे पंखे फेंक रहे गर्म हवा
-टूटे खड़ंजे पर मिट्टी डाल चल रहा काम
अमर उजाला ब्यूरो
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