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Amroha News: बात निकली तो सचमुच बहुत दूर तलक गई, मगर लिखने वाले को भूल गए

Mon, 16 Dec 2024 01:28 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
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शायर कफील आजर। - फोटो : परिजन
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अमरोहा।
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शहर में टीपी नगर चौराहे को हर कोई जानता है। बड़े चौराहे से जुड़ी राहें अलग-अलग इलाकों में पहुंचाती हैं। इनमें से ही एक रास्ता लाल मस्जिद मोहल्ले तक ले जाता है, जहां तंग गलियों से होते हुए हम उस मकान तक पहुंचते हैं जिससे निकलने वाले सामान्य शख्स ही हैं लेकिन इस मकान का ताल्लुक ऐसी शख्सियत से भी है, जिन्हें अमरोहा में रहते हुए भी आज की पीढ़ी नहीं जानती लेकिन उनकी कलम से निकले शब्दों को मंच से लेकर महफिल तक अक्सर बोलती है। यहीं नहीं फिल्मों में गूंज चुके उनके गीत भी कभी-कभी गुनगुनाती है।

हम बात रहे हैं मशहूर शायर और गीतकार कफील आजर की। ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’ ...यही वह लाइन है जो अक्सर नौजवानों से लेकर बुजुर्गों तक की जुबां से सुनाई देती है। गजल सम्राट कहे जाने वाले जगजीत सिंह की चर्चा में भी अक्सर लोग इस पंक्ति को गाकर या बोलकर अपनी बात पूरी करते हैं। लाल मस्जिद मोहल्ले का यही वह मकान है, जहां 23 अप्रैल 1940 को कफील आजर का जन्म हुआ था। अमोरहवी आबोहवा में पले-बढ़े कफील ने अपनी कलम से ऐसा बहुत कुछ लिखा, जो उनके न रहने पर भी उनकी याद दिलाता है।
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इसी पुश्तैनी मकान में आम लोगों की तरह रह रहे कफील आजर के बेटे शिक्षक यावर कफील बताते हैं कि पुराने जमाने की शायद ही कोई शख्सियत रही होगी, जो उनके पिता के फन से प्रभावित न रही हो। उनके पिता ने वक्त का सिकंदर, पुरानी हवेली, कांच की दीवार, तूफान और बिजली, आहट, चोर दरवाजा समेत 50 से अधिक फिल्मों में गीत व डायलॉग लिखे।

यावर बताते हैं कि उनके लिखे का ही दम था कि घर-परिवार के हालात अच्छे न होते हुए भी उन्होंने मुंबई की फिल्मी दुनिया तक का सफर तय किया है। 17 वर्ष की उम्र में मेरठ में रिश्तेदारी में गए। हमदर्दों की सलाह दिल्ली जाने का मन बनाया। जेब की हालत मजबूत न होने पर मेरठ से दिल्ली तक का सफर रुक-रुक कर पैदल पूरा किया।

हालात से छूटी पढ़ाई मगर हौसला नहीं छोड़ा
कफील आजर के बड़े बेटे फराज कफील और छोटे बेटे यावर कफील ने बताया कि उनके पिता की पढ़ाई कक्षा नौ तक ही हुई थी। अब्बू बताते थे कि दादा की मौत के बाद घर के हालात बिगड़ गए। अमरोहा के राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ते थे। संस्कृत पर उनकी अच्छी पकड़ थी लेकिन परिस्थितियों ने पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद नगर पालिका में नौकरी की। हालांकि नौकरी के माहौल में ज्यादा टिक नहीं सके।

कमाल अमरोही से मुलाकात ने खोली कामयाबी की राह



यावर बताते हैं कि अब्बू की मुंबई में कमाल अमरोही से मुलाकात हुई। इस मुलाकात से ही फिल्मी दुनिया में उनकी राह मजबूत होती चली गई। एक ही शहर के होने के कारण कमाल साहब अब्बू से निजी लगाव भी रखते थे। मुंबई में सेटल होने के बाद भी कफील आजर कभी-कभी अमरोहा आते रहते थे।



आज भी गुनगुनाया जाता है-छैला बाबू तू कैसा...



यावर कफील बताते हैं कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...उनकी रचनाओं में यादगार बन गई। इसके अलावा 1979 में आई फिल्म कर्तव्य में लता मंगेशकर द्वारा गाया- छैला बाबू तू कैसा दिलदार निकला...आज भी गुनगुनाया जाता है।
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दोस्त की मौत से टूट गए थे आजर
बेटे यावर ने बताया कि शहर के नौगजां मोहल्ला निवासी शबनम शाह उनके अजीज दोस्त थे। जो कमाल अमरोहवी के स्टूडियो में मैनेजर थे। अमरोहा के होने के नाते उनसे गहरी दोस्ती रही। एक बार शबनम अमरोहा आए थे और ट्रेन से मुंबई जा रहे थे। रास्ते में उनका दिल का दौरा पड़ने सेउनका निधन हो गया। इस घटना ने अब्बू को तोड़ दिया था। 27 नवंबर 2003 को उनका भी इंतकाल हो गया।
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