मैं ईदगाह हूं। मैंने करीब 350 सालों के इतिहास में तमाम उतार चढ़ाव देखे हैं, हालातों के बीच संभल कर चलना मेरी खूबी है। गुंबद और मेहराब को अपने विरासत पर नाज है। साल में दो बार मेरे दामन में नमाजियों की भीड़ उमड़ती है। ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा की नमाज अदा की जाती है। इस दौरान इत्रर की खुश्बू से मेरा दामन महक उठता है। दुआ के हाथ मिलाकर और गले मिलकर मुबारकबाद का सिलसिला मेरे ही दामन से शुरू होता है। लेकिन इस बार तस्वीर बदली है।
कोरोना के चलते नमाजियों के कदम लॉकडाउन से रुके हुए हैं। न तो नमाजियों की भीड़ होगी और न ही चमचमाते नए कपड़ों में हंसते, खिलखिलाते मासूम चेहरे होंगे। अगर कुछ होगी तो वह न दिखने वाली खामोशी। ऐसे लॉकडाउन में आपको सोशल डिस्टेंसिंग वाली ईद मुबारक। मेरी आप से गुजारिश है कि इस बार हाथ मिलाकर और गले मिलकर ईद की मुबारकबाद न दें। अगर आपने लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का एहतमाम किया तो सवा दो महीने बाद होने वाली ईद-उल-अजहा की नमाज में मेरा दामन इत्रर की खुश्बू से फिर से महक उठेगा। आप हाथ मिलाकर और गले मिलकर मुबारकबाद दे सकेंगे।
शेख गुलाम अहमद ने कराया ईदगाह का निर्माण
शहर की दक्षिण तरफ धनौरा रोड पर ईदगाह स्थित है। जानकारों के मुताबिक ईदगाह 1650 ईस्वी के आसपास निर्मित हुई है। तत्कालीन बादशाह के नुमाइंदे शेख गुलाम अहमद ने ईदगाह को बनवाया था। तारीख ए अमरोहा के अनुसार, ईदगाह का पुर्ननिर्माण सन 1764 में हुआ था। ईदगाह में शाह अब्दुल मजीद अल्वी की दरगाह है।
पहले शहर के काजी पढ़ाते थे ईद की नमाज
मुगल सल्तनत के दौर में ईदगाह बनाई गई थी। उस वक्त शहर के काजी नमाज अदा कराते थे। उन्हें पांच रुपये तनख्वाह मिलती थी। इसमें पोशाक समेत अन्य खर्च शामिल रहते थे। अब जामा मस्जिद की इंतजामिया देखरेख करती है। फिलहाल जामा मस्जिद के पेश इमाम नमाज अदा कराते हैं।
50 हजार से अधिक लोग पढ़ते हैं नमाज
ईदगाह पर साल में दो बार नमाज होती है। एक ईद-उल-फितर की और दूसरी ईद-उल-अजहा की। दोनों नमाज में ईदगाह का मैदान खचाखच भरा रहता है। यहां पचास हजार से अधिक लोग नमाज अदा करते हैं।