अमरोहा। जिंदगी देने वाली दवाओं के बाजार की मनमानी तीमारदारों को ही मरीज बना दे रही है। हार्ट अटैक से उबारने के लिए जरूरी टेनेक्टिप्लेस इंजेक्शन की कीमत बाजार में 30 से 35 हजार रुपये है, जबकि थोक में यही इंजेक्शन 12 हजार रुपये में उपलब्ध है। यही नहीं, पैरासिटामोल जैसी सामान्य गोली (10 गोली की स्ट्रिप) थोक में सिर्फ छह रुपये की है। मेडिकल स्टोर पर यही 10 से 15 रुपये में बिक रही है।
हैरानी इस बात की है कि रिटेल की दवा दुकानों पर भी कीमत एक समान नहीं है। मेडिकल स्टोर की लोकेशन के हिसाब से दाम हैं। सबसे ज्यादा कीमत उन निजी अस्पतालों में है, जिनके परिसर में ही मेडिकल स्टोर हैं। बाहर से दवा लाने पर रोक के कारण मरीज और तीमारदार को कीमत के नाम पर लूट का शिकार होना पड़ता है।
मंगलवार को दवाओं की कीमतों का सच जानने शहर में निकली संवाद टीम को एक ही दवा के जगह-जगह अलग दाम देखने को मिले। पैरासिटामोल की तरह
बुखार में इस्तेमाल होने वाली डोलो के पत्ते की कीमत किसी दुकान पर 15 रुपये थी तो कहीं 25 रुपये तक की बिक रही थी। इसी तरह एल्बुमिन, एरिथ्रोपोइटिन, मेरोपेनम, सर्जिकल ड्रेसिंग और आईवी फ्लूड जैसी दवाओं और अन्य उपचार सामग्री की कीमतों में भी भारी अंतर देखने को मिला।
ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने के में इस्तेमाल होने वाली टेल्मीकाइंड-ए एम की कीमत बाजार में 75 रुपये थी। इसी दवा का प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र पर मूल्य मात्र 35 रुपये है। बीपी की तरह ही शुगर की दवाओं की कीमतों में दुकान के हिसाब से अलग-अलग रेट मिले।
मेडिकल स्टोर के स्थान के हिसाब से कीमतों के फर्क के अलावा दवा कंपनियों के फेर से भी मूल्य में खासा अंतर देखने को मिला। बुखार, सिर दर्द, गले के सामान्य संक्रमण की एक जैसे साल्ट की अलग-अलग कंपनी की दवा की कीमत में बड़ा अंतर था। हैरानी इस बात की है कि जिस शहर में सीएमओ से लेकर ड्रग इंस्पेक्टर तक की लंबी-चौड़ी टीम है, वहां भी दवाओं की कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है। नतीजे में मरीज हो या तीमारदार, इलाज के नाम पर ठगी का शिकार हो रहे हैं।
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डॉक्टर के तय स्टोर से ही मिलती है दवा
निजी चिकित्सकों के यहां इलाज कराने वालों को मोटी फीस के साथ-साथ दवा खरीद में खासी जेब ढीली करनी पड़ती है। दरअसल चिकित्सकों के लिखे पर्चे की दवा हर स्टोर पर नहीं होती। क्लीनिक या अस्पताल से बताए गए दवा विक्रेता पर ही मिलने के कारण जो कीमत बताई जाती है, वही खरीदार को देनी पड़ती है।
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निर्देश हवाई, कहीं नहीं नजर आई रेट लिस्ट
दवा विक्रेताओं की दुकानों पर कीमतों की सूची चस्पा होने के निर्देश का कहीं अमल देखने को नहीं मिला। फुटकर से लेकर थोक बाजार तक और सामान्य मेडिकल स्टोर से लेकर निजी अस्तपालों के स्टोर तक कहीं भी दवा के मूल्य की लिस्ट नहीं लगी थी। यही नहीं, मेडिकल स्टोर से खरीदी गई दवा का पक्का बिल भी किसी दुकान से नहीं दिया जा रहा था। सादे कागज पर या दवा रखने की थैली पर सिर्फ कीमते जोड़ कर बिल की औपचारिकता पूरी की जा रही थी। यह हाल तब है जबकि कुछ समय पहले शासन की ओर से खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की आयुक्त डॉ. रोशन जैकब इस बाबत निर्देश जारी कर चुकी हैं।
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खरीद मूल्य से कई गुना ज्यादा एमआरपी
दवा कारोबार में एक और बड़ा खेल दवा निर्माता कंपनी और निजी अस्पतालों-क्लीनिकों के खामोश तालमेल का है। जानकार बताते हैं कि दवा निर्माता फर्म विभिन्न अस्पतालों या बडे़ मेडिकल स्टोरों को बड़े मुनाफे का लाभ देने के लिए उत्पादन लागत से कई गुना ज्यादा एमआरपी छापकर देती हैं। दवा निर्माता और विक्रेता के बीच लाभ के इस खेल की भरपाई मरीज से सस्ती दवा मनमानी कीमत पर बेचकर की जाती है।
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शासन से पत्र मिला है, जिसका पालन कराया जाएगा। मेडिकल स्टोरों का निरीक्षण भी किया जाएगा। कहीं अधिक रेट पर दवाएं मिलती हैं, तो संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए शासन स्तर से एक टीम भी आएगी। - रुचि बंसल, औषधि निरीक्षक
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जिला अस्पताल में निशुल्क लगता है टेनेक्टिप्लेस इंजेक्शन
दवा के रिटेल बाजार में 30 से 35 हजार रुपये तक में बिकने वाला हार्ट अटैक से जुड़ा टेनेक्टिप्लेस इंजेक्शन जिला अस्पताल में निशुल्क लगाने की सरकारी सुविधा बड़ी राहत के रूप में सामने आई है। सरकार की इस सकारात्मक पहल से कई हृदय रोगियों को बिना बड़े खर्च के बचाया जा सका है। हालांकि रात-देर रात या जिला अस्पताल से ज्यादा दूरी वाले मरीजों के मामलों में जल्द उपचार की कोशिश तीमारदारों को महंगा इंजेक्शन लगवाने के लिए मजबूर कर देती है।
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