समंदर पर रहकर तास्नाकान हूं मैं, बान तुम अब भी बह रही हो क्या.... मशहूर शायर जाैन एलिया की यह शायरी अमरोहा में उस बान नदी की खूबसूरती को आज भी जिंदा किए हुए है, जिसके किनारे वह अपनी शायरी को धार दिया करते थे।
उनकी शायरी के जरिए इस नदी को देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी जाना गया। हालांकि, बान नदी आज सूखने के कगार पर पहुंच चुकी है। पाकिस्तान जाने के बाद भी जाैन एलिया अमरोहा और इस नदी को ताउम्र दिल में बसाए रहे। अमरोहा के साहित्यिक घराने में जन्म लेने वाले सैयद जाैन असगर शायरी की दुनिया में जाैन एलिया के नाम से पहचाने गए। मोहल्ला लकड़ा में 14 दिसंबर 1931 को जन्मे जाैन एलिया का बचपन और किशोर अवस्था अधिकांश बान नदी के किनारे गुजरा।
सुबह-शाम दोस्तों के साथ इस नदी के किनारे बैठकर ही अपनी शायरी को धार देने वाले इस शायर का पाकिस्तान जाने के बाद भी अमरोहा से लगाव कम नहीं था। यही वजह है कि अपनी शायरी में भी एलिया अमरोहा और यहां कि नदियाें का अक्सर जिक्र किया करते थे।
बड़ा बाजार निवासी प्रोफेसर नासिर नकवी बताते हैं कि पाकिस्तान जाने के बाद उनका अमरोहा से कभी भी प्रेम कम नहीं हुआ। जब भी वह पाकिस्तान से अमरोहा आए तो बान नदी तक अवश्य जाते थे। उनकी शायरी में भी अमरोहा से बिछड़ने का दर्द साफ झलकता रहा है। अमरोहा पहुंचने पर उन्होंने लिखा था, इस गली ने यह कहकर सब्र किया, जाने वाले यहां के थे ही नहीं।
समय के साथ सिमट गई बान
जिस बान नदी को जाैन एलिया ने अपनी शायरी से देश और विदेशों में पहचान दिलाई। वह नदी अमरोहा के 42 गांवों से होकर गुजरती है। अपनी शायरी से उन्होंने बान नदी में डूबते सूरज की लालिमा की परिकल्पना की, लेकिन वही नदी आज सूखती जा रही है। इस नदी का अस्तित्व भी धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।
कराची में समंदर किनारे भी याद आती थी बान
भले ही जाैन आजादी के बाद पाकिस्तान चले गए हों, लेकिन वहां जाने के बाद भी उनकी शायरी में अक्सर बान नदी और अमरोहा का जिक्र हुआ करता था। इसकी झलक उनकी शायरी में साफ दिखाई देती है। कराची में समंदर के किनारे बैठकर बान नदी को याद करते हुए उन्होंने लिखा कि, समंदर पर रहकर तास्नाकान हूं मैं, बान तुम अब भी बह रही हो क्या।
आखिरी बार 1999 में आए थे अमरोहा
प्रो. नासिर नकवी के अनुसार जाैन एलिया 1999 में अमरोहा आखिरी बार आए थे। यह अमरोहा के लिए उनका आखिरी सफर रहा था। इस दौरान भी वह बान नदी को याद करने से नहीं चूके। उनकी शायरी में अमरोहा से दूर होने का दर्द भी अक्सर झलकता रहा। आठ नवंबर 2002 को उनका इंतकाल हो गया।
बान को पुराने स्वरूप में लौटाने की मांग
प्राे. नासिर नकवी के अनुसार जिस बान नदी को जाैन एलिया ने भारत के साथ विदेशों को भी अपनी शायरी के जरिए रूबरू कराया। वही बान नदी आज बदहाल हो चली है। इसका दायरा सिमटता जा रहा है और पानी का प्रवाह भी कम हो गया है। उन्होंने प्रशासन से इस नदी को पुनर्जीवित करने की मांग की है।
जाैन एलिया की प्रमुख शायरी
मैं जो हूं जाैन एलिया हूं जनाब, इसका बेहद लिहाज कीजिएगा
मत पूछो कितना गमगीं हूं गंगा जी और जमुना जी
ज्यादा मैं तुमको याद नहीं हूं गंगा जी और जमुना जी
अपने किनारों से कह दीजो आंसू तुमको रोते है
अब मैं अपना सोग-नशीं हू गंगा जी और जमुना जी
अमरोहे में बान नदी के पास जो लड़का रहता था
अब वो कहां है? मैं तो वही हूं गंगा जी और जमुना जी
महक उठा है आंगन इस खबर से
वो खुशबू लौट आई है सफर से
तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं