बेटों की चाहत में लोग बेटियों को पेट में ही कत्ल कर देते हैं। भूल जाते हैं कि बेटी नहीं होगी तो बेटे के लिए दुल्हन कहां से आएगी, लेकिन सरकार की सख्ती और लोगों की जागरूकता से लड़की व लड़के के जन्म को लेकर समाज में फैली तरह-तरह की भ्रांतियां दूर हुई हैं।
जागरूक मां-बाप दोनों को एक समान समझने लगे हैं, वहीं कन्याओं को पेट में मारने से परहेज कर रहे हैं। बेटियों को बचाने में अमरोहा के लोगों ने भी जज्बा दिखाया है। आंकड़े गवाह हैं कि बेटियों को बचाने में बिजनौर के वाशिंदे पहले नंबर पर हैं, जबकि अमरोहा दूसरे स्थान पर है।
समाज में फैली कुरीतियों को लेकर अक्सर लोग बेटियों को गर्भ में ही मार देते हैं। उनको बोझ समझने लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लोगों की सोच बदल रही है। बेटियां अब आसमान छू रही हैं। मां-बाप का नाम रोशन कर रही हैं। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जहां उन्होंने मुकाम हासिल न किया हो।
लड़कियों के बढ़ते जा रहे कदमों को देखकर अब लोग भी उनको बचाने में दिलचस्पी ले रहे हैं। बेटों की तरह अच्छी तालीम दिला रहे हैं। सरकार भी उनको बचाने के लिए सख्त कानून बना रही है। भ्रूण हत्या रोकने को उसने अल्ट्रासाउंड पर भी शिकंजा कस दिया है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि मुरादाबाद मंडल में वार्षिक हेल्थ सर्वे के अनुसार स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अमरोहा प्रति हजार पुरुषों के हिसाब से 907 महिलाएं होने के कारण दूसरे पायदान पर है, जबकि बिजनौर जनपद प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले 913 महिलाएं होने पर पहले स्थान पर है। रामपुर जिले की हालत मुरादाबाद व संभल से काफी बेहतर है, जिसकी बदौलत वह तीसरे स्थान पर है। उसका स्त्री व पुरुष का अनुपात प्रति हजार पुरुषों के हिसाब से 905 महिलाओं का है।
एनुअल हेल्थ सर्वे के अनुसार प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की स्थिति.....
जनपद-----------------पुरुष------------महिलाएं
बिजनौर.......................1000...................913
अमरोहा....................1000--------------907
रामपुर.........................1000...................905
मुरादाबाद.....................1000...................903
संभल...........................1000...................903
जिले में कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए अक्सर अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर छापामारी होती रहती है। पहली बार जिले में कमियां मिलने पर चार अल्ट्रासाउंड सील किए गए थे। आशाओं के जरिए भी स्टिंग कराया गया था, जिन्होंने अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालकों से भ्रूण की जांच को लालच दिया था, मगर सभी संचालकों ने स्पष्ट मना कर दिया था। समय-समय पर उनकी चेकिंग भी होती रहती है। इसके अलावा बेटियों को बचाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते रहते हैं।
डा. रामजी वर्मा, नोडल अधिकारी स्वास्थ्य विभाग
ये है सजा का प्रावधान
पीएनडीटी (प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक) एक्ट के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी है। ऐसे में अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े, करने वाले डाक्टर व लैब कर्मी को पांच साल सजा और 10 से 50 हजार रुपए जुर्माने तक की सजा है।