बान नदी को सूखे हुए एक दशक हो चुका है। नदी के बीच में खेतीबाड़ी हो रही है। दोनों तरफ बान नदी की हद आज भी साफ नजर आ रही है। इस कारण नापजोख करने में प्रशासन को परेशानी नहीं होनी चाहिए, लोगों की भावनाओं को देखते हुए पहले तो प्रशासन खुदाई कराने का वादा कर बैठा।
इसके लिए बकायदा-अधिकारियों और लेखपालों आदि की बैठक हुई। एस्टीमेट बनाने के भी निर्देश दिए गए। कुछ जगहों पर मौके पर जाकर भी देखा गया। रिकार्ड भी खंगाले गए मगर अब प्रशासन टालमटोल में लग गया। रिकॉर्ड की खामियां गिनाई जा रही हैं। चर्चा है कि, रसूखदार कब्जेदारों के दबाव में प्रश्ाासन लोगों की भावनाओं की अनदेखी कर कदम पीछे खींच रहा है।
उत्तराखंड से जिला बिजनौर से होती हुई अमरोहा में प्रवेश करने वाली बान नदी अब अपने अस्तित्व की तलाश में है। नदी के सूखने के साथ ही गांवों की खुशहाली भी चली गई है। प्रशासनिक स्तर से जब बान की पैमाइश और खुदाई की बात चली, तो रसूखदारों से लेकर राजस्व कर्मचारियों तक खलबली मच गई।
रसूखदार किसी तरह अवैध कब्जे बचाने के लिए राजस्व कर्मचारियों के आगे पीछे घूमने लगे। जाहिर से ही बात है बिना अफसरों की मर्जी के बान नदी की जमीन पर कब्जे नहीं कराए गए होंगे, अब अवैध कब्जे न हटें इसके लिए प्रशासनिक अफसरों ने भी खुदाई को टालने की कोशिश शुरू कर दी है। परिणाम स्वरूप अफसरों को बान नदी की हद तक दिखाई नहीं दे रही जबकि मौके पर बान नदी की हद आज भी मौजूद है। खेती बान नदी की हद के भीतर ही हो रही है। दोनों तरफ ऊंची-ऊंची हदबंदी साफ नजर आ रही है।