होली शुभ हो, हैप्पी होली, बुरा न मानो होली है लिखी टोपियां अमरोहा के नसीम जैसे कारोबारी बनाते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब का अनूठा रंग देखना है तो सांप्रदायिक एकता की मिसाल अमरोहा शहर आ जाइए। आम की मिठास के लिए देश-विदेश में मशहूर इस शहर में होली की टोपियां भी बनती हैं।
ज्यादातर कारोबार मुस्लिमों के हाथ में है। मजहबी तौर पर खुद रंग से परहेज करने वाले ये कारोबारी कई जिलों और प्रदेशों में हिंदुओं की होली में रंग भरते हैं। अमरोहा में मुस्लिम कारीगर हाथों से होली की टोपी की सिलाई करते हैं। होली से दो माह पहले टोपी तैैयार करने का कार्य शुरू हो जाता है।
पांच लाख से अधिक टोपियों की सप्लाई बाहर के लिए हो चुुकी है। एक लाख से अधिक टोपियों की सप्लाई होनी बाकी है। होली के त्योहार पर अमरोहा की टोपी की जबरदस्त मांग करती है। शहर के मोहल्ला बटवाल में कई मुस्लिम परिवार पिछले कई सौ सालों से होली की टोपी तैयार करने का कार्य करते आए हैं।
पीढ़ी दर पीढ़ी होली की टोपी तैयार करने का कार्य आज भी जारी है। यह टोपी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जनपदों के लोगों द्वारा होली पर पहनी जाती है। देखने में आकर्षक लगती हैं। टोपी में चार प्रकार के रंगों का इस्तेमाल होता है। यह टोपी अन्य टोपियों से अलग हटकर होती है।
होली से दो माह पहले टोपी तैयार करने का कार्य शुरू हो जाता है। काफी संख्या में मुस्लिम कारीगर इस कार्य में जुट जात हैं। टोपी तैयार करने का सारा कार्य हाथों से तैयार किया जाता है। यहां तक की टोपी की सिलाई भी हाथों से ही की जाती है। इसे तैयार करने में काफी समय लगता है। कारीगर इस टोपी पर अपना हुनर भी दिखाते हैं।