अमरोहा। अब इसे पलायन कहे या बेहतर रोजगार का अवसर मिलना। जिले के 110482 मनरेगा मजदूरों ने तीन साल साल से काम नहीं मांगा। जबकि प्रत्येक मजदूर को हर साल 100 दिन रोजगार मांगने का कानूनी हक है। यह मजदूर कहां हैं और क्या कर रहे हैं, इसके बारे में विभाग के पास कोई जानकारी नहीं है। इसमें 31001 महिलाएं, 30083 अनुसूचित जाति और 22 अनुसूचित जनजाति के मजदूर भी शामिल हैं। बावजूद इसके ग्राम पंचायत से लेकर मुख्यालय तक के अधिकारी चुप्पी साधे हैं।
जिले में छह ब्लॉक और 601 ग्राम पंचायतें है। जहां मनरेगा के लिए 1,49,814 जॉब कार्डधारक हैं। इसमें 2,36,898 मजदूर पंजीकृत है। इसमें 66782 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति के 56 और 62987 महिला शामिल हैं। इनमें 1,26,416 मजदूरों को ही काम मिला है। देहात में मजदूरों को काम के लिए मनरेगा लागू की गई है। इसमें प्रत्येक पंजीकृत परिवार को 100 दिन काम मांगने का कानूनी हक है। काम पूरा होने के 15 दिन के अंदर मजदूरी भुगतान करना जरुरी है। हालांकि देहात क्षेत्र के अकुशल श्रम करने वालों को ही काम मिलना है। ऐसे परिवार जो फावड़ा और मिट्टी का काम करना चाहते हैं। हालांकि काम मांगने के 15 दिन में काम देना अनिवार्य है। जिले के 57,807 जॉब कार्ड के पंजीकृत 110482 मजदूर तीन साल से गांव के प्रधान, सेक्रेटरी और रोजगार सेवक के पास काम मांगने नहीं पहुंचे। इसके पीछे की वजह पलायन है या बेहतर रोजगार मिलना है, ये कुछ कहा नहीं जा सकता है। फिलहाल ग्राम पंचायतों के पास इन लापता मजदूरों का ब्योरा तक नहीं है।
महिला मुखिया और एससी को व्यक्तिगत काम की छूट
मनरेगा की नियमावली में तमाम तरह की छूट दी गई है। महिला मुखिया, एससी और लघु सीमांत किसान को अपने व्यक्तिगत काम करा सकते हैं।
मनरेगा के तहत पशु शेड, बकरी शेड, मुर्गी पालन शेड, मछली पालन के लिए तालाब, खेत का समतलीकरण, गुल, ?नाली, कंपोस्ट पिट, सोक पिट, बंधी, मेड़ बंदी बनाया जाता है।
मनरेगा का जॉब कार्ड परिवार में एक बनता है। इसमें पति, पत्नी और उसके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं। हालांकि बालिग होना जरूरी है।
सेक्रेटरी के पास पंजीयन, उम्र 18 वर्ष या अधिक
अमरोहा। गांव के लोग सेक्रेटरी के पास पंजीयन के लिए आवेदन करते हैं। वह जांच करता है कि परिवार में जॉब कार्ड जारी तो नहीं है। 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र चाहिए। बैंक अकाउंट और फोटोग्रॉफ्स संलग्न करना होता है। इसके बाद जॉब कार्ड जारी होता है। एक जॉब कार्ड में परिवार के कई सदस्य हो सकते हैं।
अब 202 रुपये की दर से भुगतान
अमरोहा। केंद्र सरकार ने मनरेगा की मजदूरी में 20 रुपये की बढ़ोत्तरी की है। अब मजदूरों को 202 रुपये की दर से भुगतान होना है। पहले 182 रुपये की दर से भुगतान होता रहा है।
- जिले में 1.49 लाख जॉब कार्ड वेबसाइट पर दर्ज है। इसमें 100582 सक्रिय जॉब कार्ड है। एक जॉब कार्ड में परिवार के कई सदस्य हो सकते हैं। लगभग 49 हजार जॉब कार्ड निष्क्रिय है। अनुमान के तौर पर 70 हजार मजदूर हो सकते हैं, जिन्हें काम नहीं मिला है। जॉब कार्ड को निरस्त नहीं किया जाता है। श्रमिक के पलायन या मृत्यु की सूचना के बाद वेबसाइट से जॉब कार्ड को डिलीट किया जाता है।
- मिथिलेश तिवारी, प्रभारी डीसी मनरेगा
बेहतर नौकरी मिलने के चलते छोड़ दिया होगा काम
अमरोहा। मनरेगा के उपायुक्त मिथिलेश तिवारी ने बताया कि बेहतर नौकरी मिल गई हो या आय का और जरिया मिल गया हो। ऐसा हो सकता है, इसके चलते मनरेगा श्रमिकों ने रोजगार नहीं मांगा हो। सभी लोगों का सर्वे कराया जा रहा है। मनरेगा या एनआरएलएम से जोड़ा जाएगा। ताकि यह लोग आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बन सकें।
सामूहिक या एकल आवेदन करना होगा
अमरोहा। डीसी मनरेगा ने बताया कि काम के लिए सामूहिक या व्यक्तिगत आवेदन करना होगा। गांव के लोग ग्राम प्रधान, सेक्रेटरी या रोजगार सेवक से काम मांग सकते हैं। काम के दौरान श्रमिकों के मौत पर आर्थिक सहायता मिलती है। केंद्र सरकार मजदूरों को 25 हजार रुपये उपलब्ध कराती है।
ब्लॉक----------पंजीकृत------काम करने वाले
गंगेश्वरी--------49466-------27656
जोया---------48574--------22037
अमरोहा--------39007-------21121
हसनपुर--------35171--------19962
धनौरा----------32850-------17692
गजरौला--------31830--------17948
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क्या कहते हैं मजदूर
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- चार साल से काम नहीं मिला है। सेक्रेटरी और रोजगार सेवक को कई बार अवगत करा चुका हूं, लेकिन काम नहीं दिया है। इसके चलते दिक्कत हो रही है।
- कुंवर पाल, मनरेगा मजदूर, हाजीपुर तरारा
- चार साल से काम नहीं मिल सका है। कई बार मनरेगा में काम मांगा है। भरण पोषण करना मुश्किल हो गया है।
शांति, मनरेगा मजदूर, हाजीपुर तरारा
- तीन साल से काम नहीं मिला है। दिक्कत हो रही है। सेक्रेटरी और ब्लॉक का चक्कर काट चुका है। दूसरे लोगों का काम करके गुजर बसर कर रहा हूं।
विनोद, मनरेगा मजदूर, भदौरा
- गांव में काम नहीं मिल सका है। तीन साल से चक्कर काट रहा हूं। काम किया था लेकिन बकाया नहीं मिला है। लोगों के घरों का काम करता हूं। परिवार का भरण पोषण कर रहा हूं।
- हरकेश सिंह, मनरेगा मजदूर, भदौरा