अगर आपको मधुमेह की बीमारी है और माह-ए-रमजान में रोजा रखना चाहते हैं तो अभी से अपनी दवा की खुराक और समय का प्रबंधन दुरुस्त कर लें। ऐसा करने से डायबिटीज वाले रोजेदारों को रमजान में सहूलियत होगी। वह बदले डोज के साथ रोजा रख सकते हैं। वरना खाली पेट रहने पर शुगर लो होने का खतरा हो सकता है।
दीदार-ए-चांद के बाद 17 मई से मुकद्दस रमजान की शुरुआत होने की उम्मीद है। मुसलमानों पर रोजा वाजिब है। ऐसे में हर मुसलमान की कोशिश होती है वह रोजा जरूर रखे। हालांकि बीमारी की हालत में रोजा नहीं भी रखा जा सकता है। बावजूद इसके अकीदतमंद रोजा नहीं छोड़ना चाहता है। शुगर के मरीज रोजा रखने को लेकर कश्मकश में रहते हैं। क्योंकि इस मर्ज में डाक्टर मरीज को अधिक समय तक खाली पेट नहीं रखने की सलाह देते हैं। डाक्टरों ने रमजान से पहले शुगर से पीड़ित रोजेदारों को अपनी दवाओं का डोज बदलवाने की सलाह दी है। साथ ही दवाओं की टाइमिंग में भी फेरबदल करनी चाहिए। रमजान के दौरान आम दिनों की तुलना में दवाओं का डोज उलटा हो जाता है। अफ्तारी के वक्त यानी शाम को दवा की डोज अधिक होनी चाहिए। जबकि रात के समय कम मात्रा में दवा लेनी चाहिए। ऐसे ही इंसुलिन लेते समय करना चाहिए। पहले से बदले डोज और टाइमिंग पर अमल करने से रोजे के दौरान मरीज पर खास असर नहीं पड़ेगा।