हसनपुर। तहसील क्षेत्र के फौजी जयराम सिंह नागर जब लखनऊ में राजपूत रेजिमेंट में तैनात थे। तब कारगिल युद्ध से बुलावा आया। देश के लिए दुश्मन से लड़ने का मौका मिलने की खबर सुनते ही फौजी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। युद्ध के अंतिम दिनों में सीमा के करीब पहुंचे तो लेकिन गोली चलाने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। जिसका उन्हें अफसोस है। लेकिन फौजी उस युद्ध के गवाह बने। फौजी का कहना है कि देश के लिए मर मिटने का जज्बा आज भी कायम है।
तहसील क्षेत्र के गांव तरौली निवासी किसान शिवनारायन सिंह के बेटे जयराम सिंह नागर 1981 में आर्मी में बतौर सिपाही राजपूत रेजिमेंट भर्ती हुए थे। सीमा पर रहकर देश की रक्षा करने का प्रण लेकर उन्होंने हमेशा अपनी ड्यूटी निभाई। वर्ष 1999 में पाकिस्तान से हुए कारगिल युद्ध के समय के अंतिम दिनों में सीमा पर जब और सेना भेजने के आदेश केंद्र सरकार की ओर से हुए तो जयराम सिंह नागर लखनऊ में तैनात थे। उन्होंने बताया कि कारगिल से बुलावे की खबर आई तो सीना फख्र से चौड़ा हो गया। वह सीमा तक तो पहुंचे पर अफसोस है कि गोली चलाने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। वर्ष 2004 में सेवानिवृत्त होकर दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में नौकरी कर रहे हैं। जयराम सिंह ने दूरभाष पर बताया कि परिवार मेरठ में रहता है।
बेटे को सेना में भेजने की तैयारी करा रहे जयराम
हसनपुर। जयराम सिंह नागर का देश के लिए लड़ने का सपना पूरा नहीं हुआ तो वह अपने बेटे को सेना में भेजने की तैयारी करा रहे हैं। उन्होंने बताया कि परिवार मेरठ में रहता है। दो बेटे व एक बेटी है। बेटा आकाश सेना में जाने की तैयारी कर रहा है। सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा के लिए दुश्मनों के छक्के छ़ड़ाने का उसका प्रण है।