फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Amroha News: 1925 से आज तक...अमरोहा की रामलीला में जीवंत है 101 साल पुरानी विरासत

विज्ञापन
विज्ञापन
अमरोहा। शहर की प्राचीन रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अमरोहा की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सहभागिता का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में शुरू हुई रामलीला ने लोगों को रामराज्य की परिकल्पना से जोड़ने के साथ ही धार्मिक और ऐतिहासिक प्रसंगों के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया। रामलीला के साथ महाभारत, वीर अभिमन्यु, हरिश्चंद्र-तारामती, रूप बसंत, दानवीर कर्ण और अमर सिंह राठौड़ जैसे शौर्य गाथाओं पर आधारित नाटकों का मंचन भी होता था। इन आयोजनों को शहर की आबादी का भरपूर समर्थन मिला।
विज्ञापन

82 वर्षीय रमेश कुमार कालू बताते हैं कि शहर में रामलीला मंचन की शुरुआत 20वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में मानी जाती है। मोहल्ला कूचा खत्रियान नंबर एक निवासी लाला हरिराम टंडन ने अपने साथियों के साथ इसकी शुरुआत की। वर्ष 1925 में रामलीला मंचन को व्यवस्थित स्वरूप दिया गया। इसके बाद वर्ष 1948 में श्री धार्मिक रामलीला कमेटी के संयोजन में जेएस हिंदू इंटर कॉलेज के मैदान में आयोजन शुरू हुआ। यही स्थान आज भी रामलीला मंचन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। श्री धार्मिक रामलीला कमेटी के अध्यक्ष विशाल गोयल एडवोकेट वर्ष 2018 से आयोजन से जुड़े हैं। उनका कहना है कि हर वर्ष प्रयास रहता है कि परंपरा को कायम रखते हुए कुछ नया और ऐसा किया जाए, जिसे धर्मावलंबी जनमानस सहजता से स्वीकार करे।


...जब पुरुष कलाकार निभाते थे महिलाओं के किरदार

78 वर्षीय रमेश चंद गोयल एडवोकेट बताते हैं कि रामलीला के शुरुआती दौर में महिलाओं का मंच पर अभिनय करना सामान्य नहीं था। ऐसे में पुरुष कलाकार ही महिला पात्रों की भूमिका निभाते थे। चंदा मुंशी द्वारा ताड़का और पंडित गंगा शरण द्वारा माता सीता का किरदार निभाने की यादें आज भी बुजुर्गों के जेहन में हैं। कलाकार महीनों तक अभ्यास करते थे और मंचन को प्रभावी बनाने के लिए संवाद और अभिनय पर विशेष मेहनत की जाती थी।
विज्ञापन






बिना माइक गूंजती थी कलाकारों की आवाज
रमेश चंद गोयल एडवोकेट के मुताबिक शुरुआती दौर में रामलीला आयोजन के पास आज जैसे आधुनिक संसाधन नहीं थे। भोंपू और साउंड सिस्टम तक की व्यवस्था करना मुश्किल होता था। इसके बावजूद कलाकार अपनी आवाज को इस तरह साधते थे कि बिना किसी ध्वनि विस्तारक यंत्र के पूरे पंडाल तक संवाद साफ सुनाई देते थे। सीमित संसाधनों के बीच मंचन को जीवंत बनाए रखना कलाकारों के लिए बड़ी चुनौती होती थी।



महिलाओं और बच्चियों को घर से लाने की थी व्यवस्था
रामलीला को लेकर महिलाओं और बच्चों में भी हमेशा उत्साह रहा। शुरुआती वर्षों में महिलाओं और बच्चियों को आयोजन स्थल तक लाने और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सुरक्षित घर पहुंचाने की व्यवस्था कमेटी पदाधिकारियों की ओर से की जाती थी। लाला हरिराम टंडन के नेतृत्व में आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता था। रामलीला के दौरान आयोजन स्थल के आसपास छोटी-छोटी दुकानें भी लगती थीं। इससे पूरा क्षेत्र मेले जैसा नजर आता था। बताया जाता है कि कई बार दुकानदारों को अपेक्षित बिक्री नहीं होने पर उनके नुकसान की भरपाई भी लाला हरिराम टंडन स्वयं करते थे।
-

आधुनिक तकनीक से बढ़ी आयोजन की भव्यता

समय के साथ अमरोहा की रामलीला ने भी आधुनिक तकनीक को अपनाया है। वर्तमान में करीब 100 फीट लंबे और 50 फीट ऊंचे डबल स्टेज पर तकनीकी सहयोग से मंचन किया जाता है। आकाश में उड़ते रावण और जटायु जैसे पात्रों से जुड़े प्रसंगों का जीवंत प्रदर्शन दर्शकों को आकर्षित करता है। करीब 50 फीट ऊंचे जल कलश पर माता सीता के वरमाला प्रसंग का मंचन भी आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहता है।

पुराने पन्नों से इतिहास जुटा रहे भुवन

साहित्यकार पंडित भुवन शर्मा भुवन अमरोहवी ने रामलीला से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को एक जगह जुटाने का प्रयास किया है। उनका कहना है कि पुराने पन्नों और लोगों से मिली जानकारियों को जुटाने की शुरुआत मुश्किल लगी, लेकिन लगातार नए तथ्य सामने आने के बाद यह प्रयास इतिहास के खजाने को तलाशने जैसा बन गया।


इस साल 11 अक्तूबर से शुरू होगी रामलीला
अमरोहा। कमेटी अध्यक्ष विशाल गोयल एडवोकेट ने बताया कि शहर में 11 अक्तूबर से रामलीला शुरू होगी। 12 अक्तूबर को श्रवण कुमार लीला, श्रीराम जन्म, सीता जन्म, ताड़का वध और अहिल्या उद्धार होगा। 13 अक्तूबर को पुष्प वाटिका, धनुष यज्ञ, राम-सीता जयमाला और लक्ष्मण-परशुराम संवाद होंगे। 14 अक्तूबर को शाम छह बजे राम बारात निकलेगी। 15 को राम विवाह, सीता विदाई और वनवास, 16 को सीता हरण व जटायु वध, 17 को हनुमान मिलन, सुग्रीव मित्रता, बाली वध और अशोक वाटिका की लीला होगी। 18 को लंका दहन, सेतु निर्माण व लक्ष्मण-मेघनाथ युद्ध होगा। 19 अक्तूबर को कुंभकरण, मेघनाथ और अहिरावण वध होगा। 20 अक्तूबर को दशहरा मेले में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन किया जाएगा। 21 अक्तूबर को शाम छह बजे भरत मिलाप शोभायात्रा के साथ रामलीला का समापन होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें