गजरौला (अमरोहा)। गांव चकनवाला में रामगंगा पोषक नहर के पार 18 से अधिक छोटे-बड़े गांव और मझरे स्थित हैं। वहां के ग्रामीण बाढ़ के पानी के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं लेकिन वहां मूलभूत सुविधाएं ही नहीं मिल पा रही हैं।
सोमवार को अमर उजाला ने इन गांवों में पहुंचकर वहां से हालातों का जायजा लिया तो सरकारी इंतजामों एवं स्वास्थ्य के दावों की कलई खुल गई। अधिकांश गांवों में खेतों से होकर बाढ़ का पानी आबादी और सड़कों तक आ पहुंचा है। गांवों की सड़कें बाइक तो दूर पैदल चलने लायक भी नहीं हैं। कीचड़ और गंदगी पसरी हुई है। नालियों पर रोग जनित मच्छर भिनभिना रहे हैं। इतना ही नहीं किसी भी गांव में सुरक्षा एवं स्वास्थ्य के कोई इंतजाम नहीं हैं। आशंका है कि यदि गांव में बीमारी अथवा महामारी फैली तो जिम्मेदारी कौन होगा? इतना ही नहीं चकनवाला में रामगंगा पोषक नहर से गंगा पार जाने के लिए नावों पर क्षमता से अधिक सवारियां सवार हो रही हैं। ऐसे में वहां भी हादसे की आशंका बनी हुई है। अमर उजाला ने गांव वालों से बातचीत की तो उनका गुस्सा और दर्द दोनों ही छलक उठे।
इन गांवों की दुर्दशा के लिए सांसद और विधायक ही जिम्मेदार हैं। यदि वे चाहते तो अब तक पुल बन गया होता लेकिन बंगलों में रहने वाले नेताओं को खादर में रहने वालों की पीड़ा का अहसास क्यों होगा। - अशरफी देवी, गांव ढाकोवाली
रात के समय जब नदी में बाढ़ के पानी से सांय-सांय की आवाजें आती हैं तो कलेजा बैठ जाता है। उम्र यहीं गुजार दी है। अब तो दुख और परेशानी झेलने की आदत सी पड़ गई है। चिंता इस बात की है कि क्या उनके मरने के बाद उनकी संतानों को भी यही दुख सहना होगा। - नन्हे, गांव ढाकोवाली
बाढ़ का पानी घर तक आ गया है। सात बच्चों का परिवार है। आखिर छोड़कर जाएं कहां? और कहीं जाकर इनका पालन-पोषण कैसे करेंगे। यही सोचकर वर्षों से गांव में पड़े हुए हैं। आस यही है कि चकनवाला में रामगंगा पोषक नहर पर पुल बन जाए तो संकट से छुटकारा मिल जाए। - कैलाश, गांव टीकोवाली
खादर में आजीविका का एकमात्र साधन खेती ही है। बाढ़ का पानी खेतों में भरा हुआ है। मक्का की फसल, हरी सब्जियां, चरी आदि सभी नष्ट हो चुकी हैं। नेताओं, अफसरों के दावे सिर्फ अखबारों में ही नजर आते हैं। धरातल पर तो सिर्फ और सिर्फ नरक ही मौजूद है। - हुकुम सिंह, शीशोवाली