प्रदेश सरकार ने मदरसों में पढ़ने वाले तालिब-ए-इल्म को माडर्न एजूकेशन देने की कवायद शुरू की है। इस योजना पर कैबिनेट की मुहर लग गई है। लेकिन तलबा को आधुनिक बनाने में लगे मदरसा शिक्षक रोजी रोटी के मोहताज हो गए हैं। करीब तीस महीने से सूबे के पचीस हजार शिक्षकों मानदेय नहीं मिला है। यही नहीं छह महीने से प्रदेश सरकार से राज्यांश भी नहीं मिला। इसमें अमरोहा के सात सौ से अधिक शिक्षक शामिल हैं। यहां ढाई सौ मदरसों में दीन के साथ दुनियावी तालीम दी जा रही है। ऐसे में मदरसे से जुड़े ये शिक्षक रोजगार के दूसरे अवसर तलाशने में लगे हैं।
मदरसों में पढ़ने वाले तलबा को दीनी के साथ दुनियावी तालीम देने के लिए केंद्र सरकार ने 1993 में स्कीम फार प्रोवाइडिंग क्वालिटी एजूकेशन इन मदरसा (एसपीक्यूईएम) की शुरुआत की थी। मकसद तलबा को हिंदी, अंग्रेजी, गणित के साथ-साथ कंप्यूटर की शिक्षा देना था। इसके लिए मदरसा आधुनिकीकरण के तहत प्रदेश में करीब पचीस हजार शिक्षकों की तैनाती की गई है। सूबे के करीब 8200 मदरसों में दीन के साथ दुनियावी तालीम दी जा रही है।
वहीं मंगलवार को प्रदेश कैबिनेट में सूबे के मदरसों में एनसीईआरटी कोर्स लागू करने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। लेकिन सरकार ने पहले से मदरसों के बच्चों को दुनियावी तालीम दे रहे शिक्षकों का हाल जानने की कोशिश नहीं की। समय से मानदेय नहीं मिलने से ये शिक्षक कर्जदार बन गए हैं। रोजी रोटी के लाले पड़ गए हैं। उधारी लेकर परिवार का गुजारा चला रहे हैं। इन शिक्षकों को पिछले तीस महीने से मानदेय नहीं मिला है। जो केंद्र सरकार पर पांच सौ करोड़ का बाकाया है। वहीं प्रदेश सरकार की ओर से मिलना वाला राज्यांश भी छह महीने से नहीं मिला।
ऐसे हालात में मदरसा शिक्षकों को बच्चों को आधुनिक बनाने में मुश्किल हो रही है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे अधिकांश शिक्षक परिवार चलाने के लिए दूसरे रोजगार तलाशने में लगे हैं। अगर हालात यही रहे तो मदरसों में एनसीईआरटी कोर्स चलाने में संकट खड़ा हो सकता है।