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Amroha News: 24 घंटे बाद भी मृतक आसिया के मायके वालों का नहीं लगा पता, दिल्ली में खाक छान रही पुलिस

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गजरौला (अमरोहा)। थाना क्षेत्र के शकूराबाद गांव में आसिया उर्फ आलिया और उनकी तीन साल की बेटी इनाया की मौत के बाद दिल्ली में मृतका के मायके वालों का पता लगाने गई पुलिस को चौबीस घंटे बाद भी कोई सुराग नहीं मिला है। इतना ही नहीं दिल्ली में पुलिस को वह जगह भी नहीं मिली, जहां आसिया काम करती थी और आस मोहम्मद ने उसके साथ शादी की थी। उधर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस की जांच ने यू-टर्न ले लिया है। अब हत्या की ओर से पुलिस का शक दूर हो गया। पुलिस अब आत्महत्या और हादसा के एंगल पर जांच कर रही है।
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शकूराबाद गांव निवासी ओस मोहम्मद की दूसरी पत्नी आसिया उर्फ आलिया व बेटी इनाया के शव बृहस्पतिवार सुबह घर के शौचालय की छत पर रखी पानी की टंकी में मिले थे। मृतका के ससुराल वाले इसे आत्महत्या बता रहे हैं। पुलिस ने मृतका के पति आस मोहम्मद, जेठ इंतखाब को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू दी थी। देर रात मां-बेटी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई। जिसमें दोनों की पानी में डूबने से मौत की पुष्टि हुई। उधर एसपी आदित्य लांग्हे के निर्देश पर एक टीम मृतका के परिजनों का पता लगाने दिल्ली रवाना हो गई थी।
सीओ अरुण कुमार ने बताया कि दिल्ली गई टीम को 24 घंटे बाद भी मृतका के परिजनों का पता नहीं चल सका है। उधर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच-पड़ताल के बाद ये स्पष्ट हो गया है की मां-बेटी की हत्या नहीं हुई है। अब आत्महत्या और हादसा दोनों एंगल पर जांच की जा रही है। फिलहाल पति आस मोहम्मद और उसके अन्य परिजनों से पूछताछ की जा रही है।
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मां-बेटी की मौत के मामले में दो दिन बाद भी दर्ज नहीं हुई एफआईआर
शकूराबाद गांव में मां-बेटी की मौत के मामले में पुलिस ने दो दिन बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं की है। गुत्थी हत्या, आत्महत्या व हादसा में उलझी है। पुलिस किसी एक निर्णय पर नहीं पहुंची है। इतना ही नहीं पुलिस ने दो दिन बाद भी एफआईआर तक दर्ज नहीं की, जबकि पुलिस को प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज कर लेनी चाहिए थी। जिला शासकीय अधिवक्ता महावीर सिंह ने बताया कि कई बार पुलिस ऐसे मामलों में अपनी तरफ से एफआईआर दर्ज करने में बचती है। इस घटना में अगर मृतका के ससुराल वालों पर किसी तरह का शक है और उसके मायके वाले भी नहीं मिलते हैं तो पुलिस को गांव के चौकीदार, ग्राम प्रधान या वार्ड मेंबर की ओर से एफआईआर दर्ज करानी चाहिए। इस तरह के कई मुकदमे न्यायालय में विचाराधीन भी हैं, जिनमें गांव का चौकीदार वादी बना हुआ है।
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