गाय और गोकशी को मुद्दा बनाकर राजनीति करने वालों के लिए शमशाद खां और इकरार खां का परिवार एक सबक है। दोनों के पास 60-70 गायें हैं। गायों को प्यार से पाला जाता है। परिवार के लोगों से गायें इस कदर घुली मिली हैं कि छोटे-छोटे बच्चे इनके बीच खेलते रहते हैं। गायों को बांधने की जरूरत नहीं पड़ती। बाड़े में खुली ही रहती हैं। किसी की क्या मजाल जो गायों की ओर उंगली उठाकर भी देख ले। इनके लिए गाय मां से कम प्यारी नहीं हैं।
हसनपुर तहसील के जयतौली गांव की आबादी करीब छह हजार है। हिंदू और मुसलिम आबादी तकरीबन बराबर-बराबर है। इसी गांव में शमशाद खां पठान का परिवार रहता है। इकरार पठान अपनी मां नफीसा के साथ रहते हैं। दोनों के पास 60-70 गायें हैं। सभी गायें देशी नस्ल की हैं।
इकरार व शमशाद खां दिन निकलते ही गायों को चराने के लिए निकल जाते हैं। शमशाद वृद्ध हो गए हैं तथा ज्यादा दूर तक चलना फिरना उनके बस का नहीं रहा ।
अब बेटा शहजाद गायों को चराता है। गांव के जंगल के साथ ही महरपुर गुर्जर, शहवाजपुर गुर्जर, महमूदाबाद, गंगानगर, सिरसा गुर्जर तक गायों को चराते हैं। बस उन्हें कष्ट इस बात का है कि गायों के चराने के लिए कुदरती जंगल अब खत्म होते जा रहे हैं।