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नियम और आस्था का अनूठा संगम हैं कांवड़ यात्रा

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गजरौला। कांवड़ यात्रा नियम (अनुशासन) और आस्था का अनूठा संगम है। अलग-अलग क्षेत्रों में कांवड़ियों के नियम बदल जाते हैं, लेकिन सभी कांवड़ियों की मंजिल एक होती है। प्राचीन काल से चली आ रही कांवड़ यात्रा के रुप रंग में बदलाव हुआ है।
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मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव कैलाश छोड़कर धरती पर आ जाते हैं। भागवान भोलेनाथ को यह माह बेहद प्रिय है। गंगा मेें से जल भरकर शिवभक्त पैदल चलकर, भागकर आदि विभिन्न तरीकों से अपनी कठिन मंजिल को पूरा करते हैं। जिसके बाद कांवड़ में लाए गए गंगा जल से जलाभिषेक करते हैं। ‘कांवड़’ एक संस्कृत का शब्द है। कांवड़ बांस पट्टियों से बनी बहंगी होती है। गंगाजल का संगम होने पर ही यह कांवड़ भक्ति और आस्था में बदल जाती है। जिसे फूलमाला, घंटी, खिलौने और घुंघरुओं आदि से सजाया जाता है। ब्रजघाट और हरिद्वार से गंगाजल कांवड़ में लेकर कांवड़ यात्रा शुरू होती है। यात्रा के दौरान शिवभक्त सांसारिक दुनिया से अलग होकर अपने आपको अनुशासन में बांधकर रखते हैं। ब्रह्मचर्य, शुद्ध विचार, सात्विक आहार आदि का पालन किया जाता है। कांवड़ यात्रा पर निकले भक्तों के परिजन भी घर पर रहकर नियमों का पालन करते हैं। घर-परिवार के किसी सदस्य के कांवड़ यात्रा पर होने के दौरान घर में दाल या सब्जी में छौंक नहीं लगाया जाता है। कांवड़ लेने गए भोले की मां, बहन या धर्मपत्नी में से कोई एक संकल्प धारण करके विभिन्न नियमों का पालन करती हैं। वह अपने केश नहीं धोती, जमीन पर सोती है, सिलाई आदि नहीं करती हैं। कहा जाता है कि अगर परिवार में नियम का पालन नहीं होता है तो कांवड़ियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

परशुराम भी लाए थे कांवड़
बताते हैं कि परशुराम ने शिव की नियमित पूजा करने के लिए पुरा महादेव मंदिर की स्थापना की थी। परशुराम सावन माह के प्रत्येक सोमवार को कांवड़ में गंगाजल लाकर जलाभिषेक करते थे। कथाओं में कहा जाता है कि परशुराम ही पहली कांवड़ लाए थे। इसके बाद कांवड़ लाने का दौर शुरू हो गया। यह भी कहा जाता है कि शिव का परम भक्त लंका नरेश रावण भी पहले कांवड़िये रावण भी शिव को प्रसन्न करने के लिए कांवड़ में गंगाजल लेकर आता था और जलाभिषेक करता था। भगवान राम ने भी शिव की पूजा करने के साथ कांवड़ लाकर गंगाजल से अभिषेक किया था।
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