गजरौला। ये स्कूल है या तबेला। कोई अगर दारानगर के पूर्व माध्यमिक स्कूल को देखेगा तो यही बोलेगा। जी हां, स्कूल की हालत जर्जर हो चली है। कक्षाओं और बरामदे को देखने पर बिलकुल भी नहीं लगता कि ये स्कूल चल भी रहा है। चारों तरफ गंदगी आलम छाया हुआ है।
खादर के आधा दर्जन गांव में सरकारी पाठशालाएं भी चल रही है। इनमें अधिकांश स्कूलों की हालत खस्ताहाल है। अलीपुर गांव से खादर में प्रवेश करते हैं। अलीपुर के प्राथमिक स्कूल की ही बात करें तो यहां पर शौचालय नाम की कोई चीज नहीं है। स्कूल का सिर्फ एक कक्ष ठीक ठाक सा है। बाकी के फर्श दीवार और छत अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। चारों ओर जंगल से घिरे इस स्कूल में जाने का रास्ता ही शिक्षा के मंदिर की हालत को बयां करने के लिए काफी है। रास्तें में कीचड़ भरा हुआ है, दोनों तरफ झाड़िया हैं। आखिर बच्चे कैसे स्कूल तक पहुंचते होंगे, कहना संभव नहीं है। अलीपुर से आगे बढ़ते हैं दारानगर गांव के बाहरी छोर पर ही प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल हैं। इन दोनों स्कूलों की चारों तरफ से बाउंड्री गायब है। प्राइमरी स्कूल की कई कक्षाओं में दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं। जिनमें गंदगी पसरी हुई है। सिर्फ एक कक्ष में ताला लगता है। उसकी भी हालत ठीक नहीं है। एक कक्ष का दरवाजा टूटा हुआ है जोकि आज तक ठीक नहीं कराया गया। आखिर रखरखाव का पैसा कहां जा रहा है।
बराबर में उच्च प्राथमिक स्कूल के बरामदे का पूरा फर्श टूट चुका है। कक्षाओं में भी कूड़ा करकट भरा हुआ है। इस स्कूल को देखने के बाद यह नहीं बताया जा सकता है कि क्या इसमें बच्चो को पढ़ाया जाता होगा।
बाढ़ के दिनों अधिकांश बंद रहते हैं स्कूल
गांव वालों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि बरसात शुरु होने और बाढ़ का पानी आने पर बच्चो और शिक्षकों की मौज आ जाती है। पूरे सप्ताह स्कूल नहीं चलता। आए दिन स्कूल बंद ही रहता है। शिक्षक भी बाढ़ आने का हवाला देते हुए गायब हो जाते हैं। सूत्रों की मानें तो गुरुवार को भी यह स्कूल दस बजे खुला।