अमेठी। आज के समय में भरत जैसा भाई मिलना मुश्किल है, जिन्होंने राजपाट मिलने के बाद उसका त्याग करते हुए भाई के जैसा वनवासी जीवन व्यतीत किया। ये बातें बाबूपुर स्थित दंडी बाबाधाम में आयोजित श्रीराम कथा के छठे दिन बृहस्पतिवार को परमात्मा मठ प्रयागराज से पधारे प्रवाचक अजय शास्त्री ने कहीं।
प्रवाचक ने बताया कि कुसंगति में पड़कर व्यक्ति अपनों का ही नुकसान करता है और उसका परिणाम भयंकर होता है। बताया कि भरत की माता कैकेई ने दासी मंथरा के कहने पर कार्य किया। महाराज दशरथ से अपने दो वरदान मांगे, जिन्हें सुनकर महाराज दशरथ व्याकुल हो गए। महाराज दशरथ के समझाने पर भी कैकेयी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हुईं।
जब इसका पता भगवान श्रीराम को चला तो वह माता-पिता का आदेश मानकर राजतिलक को छोड़ वनवास जाने को तैयार हो गए। माता सीता और लक्ष्मण भी जिद कर भगवान श्रीराम के साथ वन के लिए प्रस्थान कर गए। प्रवाचक ने बताया कि इधर महाराज दशरथ का पुत्र वियोग में निधन हो गया। जानकारी मिलने के बाद भरत व शत्रुघ्न ननिहाल से अयोध्या पहुंचे और घटनाक्रम का पता चला तो भरत ने माता कैकेई से बात करना बंद कर दिया।
पिता के सभी संस्कार करने के बाद भरत अपने बड़े भाई प्रभु श्रीराम को लाने के लिए निकल पड़े। चित्रकूट में भरत ने श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए तमाम जतन किए, लेकिन श्रीराम ने रघुकुल की रीति और मर्यादा आदि का हवाला देते हुए उन्हें समझा कर वापस भेज दिया।