गौरीगंज (अमेठी)। प्रख्यात साहित्यकार जगदीश पीयूष का शुक्रवार देर रात निधन हो गया। 71 वर्षीय पीयूष कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। देश-विदेश में विभिन्न सम्मान से अलंकृत किए गए पीयूष के निधन के साथ ही अमेठी मेें साहित्य जगत के एक युग का अंत हो गया।
छह अगस्त 1950 को जिले के संग्रामपुर ब्लॉक के कसारा गांव निवासी एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए जगदीश प्रसाद पांडेय ‘पीयूष’ कई दशकों से शहर में ही रहते थे। उनकी गिनती जिले के संभ्रांत लोगों में थी। छात्र जीवन से ही साहित्य साधना व सृजन में जुटे रहने वाले पीयूष पहले संजय गांधी व बाद में राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे।
वे राजीव गांधी के मीडिया प्रतिनिधि भी रहे। इसके अलावा विनोद दुआ समेत देश के तमाम वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारों व एनसीपी के सांसद रहे स्व. डीपी त्रिपाठी से भी उनके मजबूत संबंध रहे। चुनाव के दौरान अमेठी आने वाले तकरीबन सभी पत्रकार उनसे मिलने के लिए लालायित रहते थे।
80 के दशक में साहित्य के साथ ही सियासी दुनिया के तकरीबन सभी बड़े आयोजनों में पीयूष की मौजूदगी होती थी। उन्होंने हिंदी ही नहीं, अवधी साहित्य सृजन के क्षेत्र में भी बड़ा काम किया। असाधारण प्रतिभा के धनी पीयूष कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। उन्हें पहले लखनऊ के मेदांता फिर दो दिन से मुंशीगंज स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान शुक्रवार रात 10 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से जिले में शोक की लहर दौड़ गई है।
अपने गीत-संवाद के बूते बालीवुड पर राज करने वाले मशहूर गीतकार मनोज मुंतशिर ने पीयूष के निधन पर गहरा शोक जताया है। सोशल मीडिया पर डाली गई एक पोस्ट में पीयूष को अवधी का वरद-पुत्र और अमेठी का पहला सेलिब्रेटी बताते हुए मनोज ने लिखा है कि उनका मार्गदर्शक चला गया। उन्होंने क्या खो दिया, यह सिर्फ उनका दिल ही जानता है।
साहित्यकार कमल नयन पांडेय, अवधी के मशहूर कवि राजेंद्र शुक्ल अमरेश व कवयित्री डॉ. अर्चना ओजस्वी ने भी पीयूष के निधन को अपूर्णनीय क्षति बताया। शनिवार को सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म पीयूष के निधन की खबर से अटे रहे।
पीयूष के निधन की सूचना सार्वजनिक होते ही उनके घर लोगों का तांता लग गया। इनमें गौरीगंज विधायक राकेश प्रताप सिंह, कांग्रेस एमएलसी दीपक सिंह, पूर्व विधायक तेजभान सिंह, कांग्रेस जिलाध्यक्ष प्रदीप सिंघल व पूर्व जिलाध्यक्ष योगेंद्र मिश्र समेत तकरीबन सभी दलों के बड़े नेता, समाजसेवी व साहित्यकार शामिल रहे।
पीयूष ने साहित्य की तकरीबन सभी विधाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने ‘सुयोधन व तथागत’ (खंडकाव्य), ‘गांधी और दलित नवजागरण’, ‘मेरा भारत महान’, ‘गांधी गांधी गांधी’ तथा ‘पानी पर हिमालय’ (हिंदी कविता संग्रह) व ‘अंधरे के हाथ बटेर’ (अवधी कविता संग्रह) की रचना की।
साथ ही उन्होंने 10 खंड में ‘अवधी ग्रंथावली’ (लोकगीत, प्राचीन कविताएं, समकालीन कविताएं, लोक कथाएं, शब्द कोष, लोकोक्ति कोष, ऋतु गीत, विमर्श खंड, लोक नाट्य) के अलावा ‘किस्से अवध के’, ‘अवधी साहित्य सर्वेक्षण और समीक्षा’, ‘अवधी साहित्य के सरोकार’, ‘लोक साहित्य के पितामह’ की भी सृजन किया। इसके साथ ही ‘बोली बानी’ (14 अंक अनियतकालीन पत्रिका) व ‘लोकायतन’ का संपादन भी किया।
पीयूष को सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन के मौके पर अमेरिका के न्यूयार्क में ‘विश्व हिंदी सम्मान’, नागरी प्रचारिणी सभा मॉरीसस द्वारा मॉरीसस में ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव सम्मान’, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘लोक भूषण’ व ‘जायसी सम्मान’ से भी नवाजा गया। 1993 में सोवियत संघ रूस में आयोजित विश्व युवा महोत्सव में सहभागिता करने के अलावा उन्होंने हिंदी व अवधी के प्रचार-प्रसार के लिए कई देशों की यात्रा भी की।
हिंदी मासिक पत्रिका ‘वागर्थ’ और ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादन समेत कई कालजयी उपन्यास व कहानियां लिखने वाले प्रख्यात साहित्यकार रवींद्र कालिया ने जगदीश पीयूष पर एक ग्रंथ लिखा।