अमेठी। परमात्मा ही इस सृष्टि का सार तत्व है। जब मनुष्य की वृत्ति परमात्मा में स्थिर हो जाती है तब संसार का अस्तित्व शून्य हो जाता है। संसार का नाश हो सकता है, लेकिन परमात्मा का नहीं, क्योंकि वे संसार से जुड़े भी हैं और उससे परे भी। यही सृष्टि का शाश्वत सत्य है। ये बातें रानीपुर करनाईपुर गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शनिवार को प्रवाचक आचार्य त्रिवेणीचंद महाराज ने कहीं। प्रवाचक ने कहा कि संसार की कोई भी वस्तु भगवान से अलग नहीं है। जैसे आकाश में बादल रहते हैं, लेकिन बादल मिटने पर भी आकाश समाप्त नहीं होता।
वैसे ही सृष्टि के लुप्त होने पर भी परमात्मा का अस्तित्व बना रहता है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए बताया कि जब श्रीकृष्ण गोपियों के घरों से माखन चुराते थे तो उसका भी गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ था। दूध का सार तत्व माखन है। उसी प्रकार सृष्टि का सार तत्व परमात्मा है।
प्रवाचक ने कहा कि प्रभु यह संदेश देना चाहते हैं कि मनुष्य को भौतिक वस्तुओं में समय और शक्ति नष्ट करने के बजाय अपने भीतर स्थित परमात्मा की खोज करनी चाहिए। जीवन का कल्याण तभी संभव है जब आत्मा का जागरण हो और मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण केवल ग्वालबालों के सखा नहीं, बल्कि उनके आत्मिक गुरु भी थे। उन्होंने संसार को सुंदर जीवन जीने का पाठ सिखाया। कथा के अंत में मुख्य यजमान मनीषा पांडेय, रविंद्र कुमार और अमन दुबे ने व्यासपीठ की आरती उतारी।