बाजारशुकुल। मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण उसका अहंकार है। जब तक हृदय में मैं और मेरा का भाव रहेगा, तब तक ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। ये बातें व्यौरेमऊ गांव में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन प्रवाचक आचार्य महेशदास मिश्र महाराज ने कहीं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मनोहारी वर्णन किया।
प्रवाचक ने माखन चोरी प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि यह केवल एक बाल लीला नहीं, बल्कि भक्तों के हृदय को चुराने की दिव्य कला है। उन्होंने आध्यात्मिक उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार दही को मथने के बाद ही मक्खन ऊपर आता है, ठीक उसी प्रकार जब मनुष्य अपने मन को भक्ति और सत्संग से मथता है, तभी उसके भीतर ज्ञान रूपी मक्खन प्रकट होता है। बुराई रूपी विष को खत्म करना ही मानवता है। कथा के दौरान कालिया नाग मर्दन के प्रसंग ने भक्तों को भाव विभोर कर दिया।
प्रवाचक ने संदेश दिया कि कालिया नाग असल में मनुष्य के भीतर का वह विष है जो समाज को दूषित करता है। अपने भीतर पनप रहीं बुराइयों और विकारों को खत्म करना ही सच्ची मानवता है। उन्होंने आह्वान किया कि निस्वार्थ प्रेम ही वह एकमात्र मार्ग है जिससे परमात्मा को पाया जा सकता है। इस अवसर पर संजय शुक्ल, अरविंद, राजेश, राजकुमार आदि उपस्थित रहे।