गौरीगंज : लखनऊ-वाराणसी हाईवे की इसी भूमि के अधिग्रहण में हुई है अनियमितता। -संवाद
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गौरीगंज (अमेठी)। मुआवजे के नाम पर अफसरों द्वारा 384 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि लुटाने के मामले में प्रशासन (गवाह) व एनएचएआई (मुद्दई) की स्थित गवाह चुस्त और मुद्दई सुस्त वाली है। आलम यह है कि प्रशासन जहां पूरे मामले को सामने लाने की कोशिश में जुटा है, वहीं उदासीन बना एनएचएआई ज्यादा रुचि नहीं ले रहा है।
लखनऊ से वाराणसी के बीच निर्मित एनएच-56 के लिए मुआवजा अधिग्रहण के दौरान जिले में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई। अफसरों ने निर्धारित सर्किल रेट व कई अन्य मानकों को दरकिनार करते हुए किसानों को मालामाल कर दिया। अफसरों ने ऐसे किसानों को भी हाईवे चौड़ीकरण में शामिल जमीनों के बराबर मुआवजा दे दिया, जिनकी जमीनें चौड़ीकरण में न होकर अलग से बनने वाले बाईपास के लिए अधिग्रहीत की गई थीं।
मुआवजे के नाम पर हुए इस खेल में एनएचएआई पर 180 करोड़ रुपये के बजाय 564 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा। इस घपले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो सके, इसको लेकर प्रशासन जहां पूरी तरह गंभीर दिख रहा है, वहीं एनएचएआई कोई खास रुचि नहीं दिखा रही। दूसरी ओर, 10 गांवों से जुड़े वाद के मामले में जिला मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोमवार को 1062 किसानों को नोटिस जारी की है।
इन गांवों के किसानों से 21 नवंबर से पहले लिखित जवाब दाखिल करने को कहा गया है। उम्मीद जताई जा रही है कि 21 नवंबर के बाद इस मामले की सुनवाई प्रतिदिन हो सकती है। यदि ऐसा हुआ तो 21 नवंबर के बाद किसी भी दिन दोनों बाईपास में किए गए भूमि अधिग्रहण के अवार्ड को निरस्त किया जा सकता है।
सुस्ती का आलम यह है कि एनएचएआई अब तक उन 20 गांवों में गड़बड़ी का वाद तक नहीं दायर कर सकी है, जहां के किसानों को अफसरों ने निर्धारित से कई गुना अधिक मुआवजा दे दिया। एनएचएआई ने दो वर्ष पूर्व जिन 10 गांवों का वाद दायर किया गया था उसमें भी प्रभावी पैरवी नहीं कर रही। ऐसे में लोगों को यह सवाल भी परेशान कर रहा है कि आखिर 384 करोड़ की इस गड़बड़ी के मामले में एनएचएआई के अधिकारी चुप क्यों हैं।