अंबेडकरनगर। रंगदारी, धमकी और आपराधिक षड्यंत्र के मामले में मुंबई जेल में काला घोड़ा कांड में बंद आरोपी जफर सुपारी उर्फ खान जफर को सत्र न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। सत्र न्यायाधीश चंद्रोदय कुमार ने आरोपी की पहली नियमित जमानत अर्जी तकनीकी आधार पर खारिज कर दी। न्यायालय ने पाया कि जमानत प्रार्थना पत्र के समर्थन में लगाया गया पैरोकार का शपथपत्र फर्जी पाया।
मुकदमे के अनुसार हंसवर थाना क्षेत्र के चकदाऊदपुर निवासी उजैर अहमद ने एक मई 2024 को पुलिस को दी तहरीर में बताया था कि वह सऊदी अरब में रहकर मजदूरी करते हैं। रमजान से पहले छुट्टी पर गांव आने के दौरान उसे एक अज्ञात मोबाइल नंबर से फोन आया। फोन करने वाले ने स्वयं को जफर सुपारी का आदमी बताते हुए रंगदारी मांगी। फोन के बाद लगातार धमकी भरे संदेश आने लगे। विरोध करने पर गाली-गलौज करते हुए जान से मारने की धमकी दी गई।
डर के कारण उसने कथित रूप से बताए गए कोटक महिंद्रा बैंक के खाते में अलग-अलग तारीखों में 2 लाख 95 हजार रुपये स्थानांतरित कर दिए थे। पीड़ित ने यह भी आशंका जताई कि उसके क्षेत्र के कुछ लोग उसकी गतिविधियों की जानकारी आरोपियों तक पहुंचा रहे थे, जिससे उसे अपने और परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा महसूस हो रहा था। इस मामले में पुलिस ने माफिया खान मुबारक के बड़े भाई जफर सुपारी व अन्य अज्ञात के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर ली थी। इस मामले में पैरोकार की ओर से जमानत अर्जी दाखिल की गई थी।
सुनवाई के दौरान ग्राम रसूलपुर खासपुर निवासी नेबूलाल स्वयं न्यायालय में उपस्थित हुए और व्यक्तिगत शपथपत्र देकर बताया कि उन्हें किसी बाहरी व्यक्ति से जानकारी मिली कि उन्हें जफर सुपारी की जमानत अर्जी में पैरोकार और शपथकर्ता बना दिया गया है। नेबूलाल ने न्यायालय को बताया कि वह आरोपी जफर सुपारी को जानते तक नहीं हैं। उन्होंने फर्जी शपथपत्र को सुरक्षित रखने और जालसाजी की जांच कराने का अनुरोध किया।
न्यायालय ने स्वयं नेबूलाल की मौजूदगी में जांच की। अदालत ने पाया कि जमानत अर्जी पर लगी फोटो वास्तव में नेबूलाल की ही है लेकिन उनके ताजा हस्ताक्षरों की तुलना शपथपत्र पर किए गए हस्ताक्षरों से करने पर दोनों पूरी तरह अलग पाए गए। न्यायालय ने तकनीकी आधार पर निरस्त अर्जी निरस्त कर। साथ ही विवादित शपथ पत्र और नेबूलाल के सत्यापन आवेदन को भविष्य की विधिक जांच के लिए सुरक्षित रखने का आदेश दिया गया।