बाल मजदूरी से बच्चों को निजात दिलाने को लेकर प्रशासनिक अमला बेपरवाह है। साल 2015 में सिर्फ सात जगहों पर छापे डाले गए। इनमें सिर्फ तीन बच्चों को मुक्त कराया जा सका, जबकि एक अनुमान के अनुसार जिले में 400 से अधिक बच्चे बाल मजदूरी में लिप्त हैं। इनके पुनर्वास को लेकर प्रशासन पूरी तरह से उदासीन है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि साल भर में जो तीन बच्चे बाल मजदूरी करते मिले थे उन्हें परिवारीजनों को ही सौंप दिया गया।
ये बच्चे दोबारा मजदूरी न करें, इसे लेकर प्रशासन ने पुनर्वास संबंधी कोई भी लाभ परिवारीजनों को नहीं दिया। जिले में श्रम प्रवर्तन विभाग के पास बाल मजदूरी रोकने की जिम्मेदारी है। पर न तो श्रम प्रवर्तन विभाग और न ही प्रशासनिक अधिकारी बाल मजदूरी पर अंकुश लगाने को लेकर कोई सार्थक कार्य कर पाए है। औपचारिकता निभाने की बात छोड़ दी जाए तो पूरे वर्ष ऐसा कोई अभियान नजर नहीं आया, जिससे बाल मजदूरी को रोकने को लेकर कोई सकारात्मक संदेश दिया जा सके।
बीत रहे वर्ष में ढाबों, चाय के होटलों से लेकर ईंट-भट्ठों में मजदूरी कर रहे बच्चों को मुक्त कराने के लिए सिर्फ सात स्थानों पर ही छापेमारी की जा सकी। इन छापेमारी में मात्र तीन बच्चों को ही बाल मजदूरी से मुक्त कराया जा सका। इन बच्चों के लिए नियमानुसार पुनर्वास का प्रबंध होना चाहिए, जिससे उन्हें बाल मजदूरी से छुटकारा मिल सके और वे पढ़ाई की तरफ अपना ध्यान लगाकर आगे का भविष्य बेहतर कर सकें। पर यह सब करने की बजाए इन बच्चों को उनके परिवार के पास ही भेज दिया गया।
मंगलवार को जब ‘अमर उजाला टीम’ ने चाय के होटलों व ढाबों का जायजा लिया, तो कई स्थानों पर बच्चे काम करते नजर आए। टांडा रोड पर स्थित एक चाय के होटल पर काम कर रहे 13 वर्षीय छोटू ने कहा कि परिवार में केवल पिता ही मजदूरी करते हैं। उसके तीन छोटे भाई बहन हैं। ऐसे में परिवार का खर्च चलाने के लिए मजदूरी करना मजबूरी बनी हुई है। बसखारी रोड स्थित एक पान की दुकान पर काम रहे 14 वर्षीय पप्पू ने कहा कि उसके पिता लंबे समय से बीमार हैं। घर का खर्च चलाना है। ऐसे में अगर मजदूरी न की तो घर वाले क्या खाएंगे।
दुकानदारों को जारी किया गया नोटिस
बाल मजदूरों को मुक्त कराने के लिए समय-समय पर अभियान चलाया जाता है। दिसंबर में ही कई स्थानों पर छापेमारी की गई। बच्चों से काम कराने पर संबंधित दुकानदारों को नोटिस जारी किया गया। संतोषजनक जवाब न दिए जाने पर बाल श्रम कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। जिन बच्चों को मुक्त कराया गया, उनके नाम भी स्कूलों में लिखाए गए, लेकिन बाद में वे स्कूल नहीं गए।
-विजय प्रताप यादव, श्रम प्रवर्तन अधिकारी