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Ambedkar Nagar News: दूर होगा भाजपा का सूखा या बहेगी सपा की बयार

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अंबेडकरनगर।
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कटेहरी का उपचुनाव तीन प्रमुख राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। भाजपा के समक्ष यहां तीन दशक से चला आ रहा जीत का सूखा दूर करने की चुनौती है तो सपा पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली जीत की लय को बरकरार रखना चाहती है। बसपा इस जुगत में है कि अन्य दोनों दलों के मतों में बिखराव का फायदा उठाकर वह फिर से अपनी धमक जिले में स्थापित कर सके।
कटेहरी उपचुनाव बेहद दिलचस्प हो गया है। सवाल विधायक चुने जाने से आगे बढ़कर अब प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए अवध की सरजमी पर दबदबा स्थापित करने का है। इसलिए भाजपा, सपा और बसपा ने यहां अपने प्रत्याशी की जीत के लिए पूरी ताकत लगा दी है। भाजपा की तरफ से कमान स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभाली है तो सपा की तरफ से जिम्मा पार्टी महासचिव शिवपाल सिंह यादव के कांधे पर है। बसपा के लिए प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल दिन-रात एक किए हैं।
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वर्ष 1991 के चुनाव में अनिल तिवारी की जीत के बाद से भाजपा को यहां शिकस्त ही मिलती आ रही है। दो बार सहयोगी दल को सीट देने के बाद भी राजनीतिक भूमि उर्वरा साबित नहीं हुई। कभी बसपा से इस सीट पर जीत का हैट्रिक लगा चुके धर्मराज निषाद के सहारे भाजपा इस बार जीत का सूखा दूर करने की उम्मीद में है।

सपा ने वर्ष 2012 में इस सीट पर शंखलाल मांझी की जीत के साथ सफलता पाई थी। वर्ष 2022 में सपा से लालजी वर्मा जीते। उनके इसी वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में सांसद चुने जाने के बाद हो रहे उपचुनाव में सपा सीट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए पूरी कोशिश में जुटी है। लालजी की पत्नी शोभावती चुनाव मैदान में हैं। बीते लोकसभा चुनाव में जीत से उत्साहित सपा नहीं चाहती कि विधानसभा के सामान्य चुनाव से पहले कोई नकारात्मक संदेश जाए। इसलिए यह सीट वह अपनी झोली में ही रखने की जद्दोजहद में है।
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बसपा यहां वर्ष 1993 से लेकर अब तक हुए सात विधानसभा चुनाव में से पांच बार जीत चुकी है। बीते लोकसभा चुनाव में जब बसपा का प्रदेश में निराशाजनक प्रदर्शन रहा था तब पार्टी प्रत्याशी यहां बेहतर स्थिति में रहा। बसपा ने यहां कांग्रेस से आए अमित वर्मा को मैदान में उतारा है। युवा प्रत्याशी अमित पहले यहां कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके हैं। बसपा इस सीट को जीतकर यह संदेश देने की कोशिश में है कि कभी गढ़ रहे अंबेडकरनगर में अभी उसके फिर से उबरने की संभावना बची हुई है।
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