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उपेक्षा का दंश झेल रहा टांडा नगर का ऐतिहासिक घंटाघर

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विद्युतनगर। औद्योगिक नगरी टांडा का करीब नौ दशक पुराना ऐतिहासिक घंटाघर उपेक्षा का शिकार है। घंटाघर के शिखर पर लगी घड़ी की रफ्तार कब की थम चुकी है। लंबे अर्से से लोगों को घड़ी की सुइयां चलती नहीं दिख सकी हैं। कभी सैकड़ों लोगों को घंटाघर से ही समय की जानकारी हो पाती थी। कारण यह था कि तब घड़ी सिर्फ रइसों के पास ही हुआ करती थीं। ऐसे में आम लोगों को समय की जानकारी घंटाघर में लगी घड़ी से ही हो पाती थी। इस बीच अब नगर पालिका प्रशासन को इस एतिहासिक विरासत को संजोए रखने की सुध नहीं है। घंटाघर अब अपने अस्तित्व से जूझता नजर आ रहा है।
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पवित्र सरयू नदी की गोद में बसे एतिहासिक टांडा नगर की पहचान दशकों पुरानी है। औद्योगिक नगर के रूप में प्रसिद्ध टांडा में कई प्रांतों के व्यापारियों का आवागमन हुआ करता था। बड़ी संख्या में व्यापारी यहां से कपड़ों का व्यापार करते थे। अब हालात बदल गए हैं। टेरीकॉट कपड़े को लेकर नगर की जो पहचान थी, वह अब धीरे धीरे छिनती जा रही है।
शासन प्रशासन की उपेक्षा का आलम है कि कभी सैकड़ों परिवारों व लोगों को समय की सही जानकारी देने वाला घंटाघर भी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। करीब नौ दशक पहले स्थापित इस घंटाघर की विशेष महत्ता थी। बताया जाता है कि अंग्रेजी शासनकाल में तत्कालीन पालिका अध्यक्ष बलभद्र प्रसाद ने वर्ष 1928 में इसका निर्माण कराया था। इससे टांडा को एक नई पहचान मिली थी। इसके अलावा यहां के नगरवासियों व यहां आने वाले व्यापारियों को समय की भी जानकारी हो जाया करती थी।
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चारों दिशा से लोग समय देख सकें, इसके लिए घंटाघर के शिखर पर चारों दिशाओं में एक-एक घड़ी लगाई गई। इसमें से दो घड़ियां बीते वर्ष चोरी हो गईं। शेष दो लंबे समय से खराब पड़ी हैं। इसके चलते घंटाघर में लगी घड़ियों की टिक-टिक बंद हो गई है। नगर चौक के राजू गुप्त, सतीश वर्मा, कृष्ण कुमार सोनी, सुरेश बजाज, संजय चौरसिया का कहना है कि यह बात अलग है कि अब समय देखने के लिए लोगों के पास कई संसाधन मौजूद हैं, लेकिन घंटाघर की उपेक्षा ठीक नहीं है।
घंटाघर टांडा नगर नहीं बल्कि समूचे जिले की धरोहर है। उसे सुरक्षित रखने के लिए नगर पालिका प्रशासन के अलावा शासन व प्रशासन को भी ध्यान देना चाहिए। नगर के मोहम्मद मक्की, अख्तर हुसैन, मोहम्मद सरफराज आदि का कहना है कि घंटाघर का सौंदर्यीकरण कराकर दोबारा घड़ी लगाए जाने की जरूरत है।
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जल्द दिखेगा व्यवस्था में सुधार
नगर पालिका क्षेत्र में स्थापित एतिहासिक घंटाघर की उपेक्षा जैसी कोई बात नहीं है। वह एक एतिहासिक धरोहर है, जिसकी सुरक्षा व अन्य प्रबंध तय होंगे।
आशीष ओझा, अधिशाषी अधिकारी, नगर पालिका, टांडा
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