अंबेडकरनगर। विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी एक्ट चिंताराम की अदालत ने मारपीट, गाली-गलौज और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के करीब 22 साल पुराने मामले में तीन आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों में विरोधाभास, प्राथमिकी दर्ज कराने में 11 दिन की देरी और चिकित्सीय साक्ष्य से आरोपों की पुष्टि नहीं होने को महत्वपूर्ण माना।
बेवाना क्षेत्र के सरखने किशुनीपुर गांव निवासी राम अवध ने 26 अप्रैल 2004 की घटना के संबंध में छह मई को रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि मतदान कर घर लौटते समय पुरानी रंजिश को लेकर राजेश कुमार दूबे, सुशील कुमार दूबे और सुरेश कुमार दूबे ने गाली-गलौज करते हुए लाठी-डंडों से मारपीट की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।
सुनवाई के दौरान वादी ने आरोपों का समर्थन किया, लेकिन जिरह में बताया कि चुनाव के दौरान उसका विवाद मुख्य रूप से राजेश दूबे से हुआ था। सुशील और सुरेश से उसका कोई झगड़ा नहीं हुआ। वहीं गवाह राम अचल ने घटना देखने से ही इन्कार कर दिया। अन्य गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास सामने आया।
अदालत ने पाया कि घटना के 11 दिन बाद प्राथमिकी दर्ज कराई गई, लेकिन देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। चिकित्सीय साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी की पुष्टि नहीं करते हैं। ऐसे में आरोप संदेह से परे साबित न होने पर अदालत ने राजेश कुमार दूबे, सुशील कुमार दूबे और सुरेश कुमार दूबे को दोषमुक्त कर दिया।