बसखारी (अंबेडकरनगर)। क्षेत्र के नवदुर्गा महाविद्यालय खसरोपुर में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। रविवार को कथा प्रवाचक पंडित जगजीवन पांडेय ने श्रद्धालुओं को भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की अटूट मित्रता, यदुवंश के विनाश और श्रीकृष्ण के महाप्रयाण का प्रसंग सुनाया।
प्रवाचक ने कहा कि यदि किसी को मित्रता का आदर्श देखना है तो उसे श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का स्मरण करना चाहिए। गुरुकुल काल में गुरु माता ने दोनों को कुछ चने खाने के लिए दिए थे। सुदामा ने यह रहस्य जानकर अपने मित्र को संकट से बचाने के लिए स्वयं वह चना खा लिया और जीवनभर दरिद्रता का दुःख सहन किया। यही सच्ची मित्रता है, जिसमें अपने सुख से पहले मित्र की रक्षा होती है। जब पत्नी के आग्रह पर सुदामा अपने बाल सखा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे तो द्वारपालों ने उन्हें पहचानने से इन्कार कर दिया, लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण को जानकारी मिली। वे स्वयं दौड़कर सुदामा को लेने पहुंचे। श्रीकृष्ण ने अपने मित्र को आलिंगन में लेकर कहा कि मित्र का परिचय वेशभूषा से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता से होता है। भगवान ने उन्हें अपार ऐश्वर्य प्रदान करना चाहा, किंतु सुदामा ने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा कि उन्हें केवल ईश्वर भक्ति का आनंद ही पर्याप्त है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के पश्चात यदुवंशियों में अहंकार उत्पन्न हो गया। एक बार कुछ यदुवंशी युवकों ने दुर्वासा ऋषि की परीक्षा लेने के लिए एक बालक के पेट पर लोहे का तवा बांधकर और स्त्री के वस्त्र पहनाकर पूछा कि यह संतान कैसी होगी। ऋषि ने क्रोधित होकर श्राप दिया कि यही तवा यदुवंश का सर्वनाश करेगा। यदुवंश के विनाश के पश्चात भगवान एक पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे। तभी एक आखेटक ने उनके लाल चरणों को हिरण समझकर बाण चला दिया। बाण लगते ही आखेटक भयभीत होकर क्षमा मांगने लगा, किंतु भगवान ने उसे सांत्वना दी और कहा कि यह सब उनकी ही इच्छा से हुआ है। इसके पश्चात श्रीकृष्ण धीरे-धीरे अंतरध्यान हो गए और उनकी लीलाओं का समापन हुआ।