घाघूपुर में मिट्टी के दीये तैयार करता कुम्हार।
कटेहरी (अंबेडकरनगर)। दीपावली आने से पहले ही कई कुम्हारों के चेहरे चमकने लगे हैं। उनके हाथ चाक पर तेजी से चल रहे हैं। महंगाई ने दीप के कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव जरूर डाला है, लेकिन इसके बाद भी मिट्टी के दीयों को तैयार करने की परंपरा को कई परिवार आगे बढ़ा रहे हैं।
रोशनी के पर्व दीपावली की तैयारियां जिले में शुरू हो गई हैं। जगह-जगह रंगबिरंगी आकर्षक बिजली झालरों की दुकानें भी सजने लगी हैं। इन सबके बीच मिट्टी के दीयों का निर्माण भी तेजी से शुरू हो गया है। कुम्हार की चाक इन दिनों तेजी से घूमते हुए मिट्टी के दीयों और खिलौनों का निर्माण कर रही है।
तैयार किए 10 हजार दीये
विकासखंड कटेहरी के घाघूपुर निवासी 65 वर्षीय गुरुप्रसाद बताते हैं कि लंबे समय से उनका परिवार मिट्टी के दीयों का निर्माण करता चला आ रहा है। आधुनिकता के दौर में इसकी मांग में कुछ कमी आई है। इसे देखते हुए ही इस बार 10 हजार मिट्टी के दीपक तैयार किए हैं। विगत वर्ष 12 हजार दीये तैयार किए थे। एक तो मांग कम है और उस पर से ईंधन महंगा हो गया है। मिट्टी के दीपक को पक्का करने के लिए उपलों का प्रयोग होता है। पिछले दो वर्ष से उपलों के दाम में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। कहा कि 150 रुपये प्रति सैकड़ा दीये की बिक्री हो रही है। इस पर लागत लगभग 80 रुपये प्रति सैकड़ा आ रही है। मुनाफा भले ज्यादा दिखता है, लेकिन निर्माण मेंं काफी मेहनत लगती है।
लागत आ रही अधिक
तहसील क्षेत्र जलालपुर के मधईपट्टी निवासी गौतम प्रजापति ने कहा कि जो उपले दो वर्ष पहले लगभग 1200 रुपये में प्रति चार सौ मिलते थे वे अब लगभग ढाई हजार रुपये में मिल रहे हैं। इससे मिट्टी के दीये बनाने में लागत अधिक आ रही है। परिवार में इसके निर्माण की परंपरा चली आ रही है। इसे हम लोग आगे बढ़ा रहे हैं। बताया कि 140 रुपये प्रति सैकड़ा की दर से बिक्री की जा रही है। इसके अलावा मिट्टी के खिलौने भी बनाए जा रहे हैं। इसकी मांग ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बनी हुई है।