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स्टोन व चाइनीज राखियों का बाजार में दबदबा

Fri, 21 Aug 2015 11:56 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/अंबेडकरनगर
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इसमें चाइनीज राखियों ने दबदबा बना रखा है। चाइनीज व स्टोन की राखियां आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। उधर तमाम बहनों ने बाहर रहने वाले भाइयों को अभी से राखियां भेजना शुरू कर दिया है।पिछले वर्ष  की अपेक्षा इस वर्ष राखी के दामों में लगभग 5 से 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन खरीददारी पर इसका कोई असर नहीं है।  
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रक्षाबंधन पर्व को लेकर जिले में तैयारियों ने जोर पकड़ लिया है। किशोरियां, युवतियां व महिलाओं ने राखियों की खरीददारी शुरू कर दी है। राखी की खरीददारी को देखते हुए जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण क्षेत्रों की छोटी बड़ी बाजारों में रंगबिरंगी राखियों की दुकानें सज गई हैं।

इन दुकानों पर अपनी मनपसंद राखियों की खरीददारी करने के लिए सुबह से लोग बाजारों में ाना शुरू कर देते हैं। यह क्रम देर शाम तक चलता रहता है। इस वर्ष राखियों के दामों में 5 से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है, लेकिन इसकी खरीददारी पर किसी प्रकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई राखी की खरीददारी में लगीं युवतियों के उत्साह के आगे दम तोड़ती नजर आ रही है।
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विगत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष भी चाइनीज राखियों का बाजार में दबदबा कायम है। दरअसल विभिन्न दरों में उपलब्ध होने के साथ ही वह अत्यंत आकर्षक होने के चलते युवाओं के बीच अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं। इसके अलावा मुंबई निर्मित स्टोन की राखियां भी लोगों के बीच अपना स्थान बनाए हुए हैं।

जिला मुख्यालय की प्रमुख बाजारों में से एक शहजादपुर के राखी व्यवसाई बाबू राखी वाले ने बताया कि राखी के दाम में विगत वर्ष की आपेक्षा वृद्धि तो हुई है, लेकिन उसकी खरीददारी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। बताया कि जिन राखियों की मांग अधिक है, उनमें चायनीज राखियों फ्लोरा राखाी, सोफिया व रिया के अलावा मुंबई निर्मित ओमश्री, अशोक चक्र, सहेली, जलाशीष, गनेश व संगम मार्का राखियां शामिल हैं।

जिले में लगभग आठ वर्ष पहले तक राखी बनाए जाने का कारोबार चलता था, लेकिन बढ़ती महंगाई एवं बाहरी रंगबिरंगी व भड़कीली राखियों के बाजार में आने से धीरे धीरे कारोबार बंद हो गया। राखी के कारोबार में लगे शहजादपुर के मन्ने खां बताते हैं कि पहले उनका परिवार फूल वाली राखी बनाता था।

रक्षाबंधन पर्व से एक माह पूर्व से ही बनाना शुरू कर दिया जाता था। जब बाजार में भड़कीली राखियां आईं, तो फूल वाली राखियों की मांग घटने लगी। इसके बाद कारोबार में घाटा हुआ, तो बनाना बंद कर दिया। अकबरपुर के राजाराम बताते हैं कि उनका परिवार सोख्ते वाली राखी बनाया करते थे। बाद में जब राखी बनाने की सामग्रियों के दाम में वृद्धि हुई, लेकिन राखी के दाम में उसकी अपेक्षा वृद्धि नहीं हुई, तो मजबूरन राखी बनाना लगभग आठ वर्ष पूर्व बंद कर दिया।
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