जिले में वन क्षेत्रफल बचाए रखने या उसे बढ़ाने को लेकर पूरी तरह बेफिक्री का माहौल है। बीते वर्षों में तेंदुए के हमले से करीब छह लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। वहीं, पेड़ों की कटान से वनरोज किसानों की फसल चट कर रहे हैं।
वन विभाग को इन सब की तरफ ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं है, जिसके कारण समस्या दूर होने का नाम नहीं ले रही है। सीतापुर में आबादी के बीच तेंदुए के घुसने और ग्रामीणों पर हमला किए जाने की घटना को घटते वन क्षेत्रफल का परिणाम माना जा रहा है।
अंबेडकरनगर में लगभग चार वर्ष पूर्व टांडा में तेंदुए के हमले की घटना सामने आयी थी। इसमें छह से अधिक नागरिक घायल हुए थे। बाद में वन विभाग ने पिंजड़ा लगाकर कई दिनों की मेहनत के बाद तेंदुए को पकड़ने में सफलता पायी थी।
दो वर्ष पूर्व अहिरौली, इब्राहिमपुर व भीटी थाना क्षेत्र में जंगली सूकरों के अलग-अलग हमले में करीब 12 लोग घायल हुए थे। इनमें से चार लोग तो तब घायल हुए थे, जब जंगली सूकरों ने आबादी में पहुंचकर हमला बोल दिया था। सड़कों पर तेजी से विचरण की घटनाएं भी बढ़ी हैं, जिससे आए दिन दुर्घटनाओं में लोग घायल होते रहते हैं।
बीते एक वर्ष में कई लोग इनकी चपेट में आकर सड़कों पर घायल हो चुके हैं। अंबेडकरनगर में यूं तो कोई बड़ा वन क्षेत्र नहीं है, लेकिन छोटे-छोटे वन क्षेत्रों पर लकड़ी माफियाओं की नजर पड़ चुकी है। नतीजा यह है कि उनका अस्तित्व लगातार खतरे में पड़ता जा रहा है।
सरकारी रिकॉर्ड में तो स्थिति पूरी तरह से दुरुस्त नजर आती है, लेकिन स्थिति इसके उलट है। यहां 10 वर्ष पूर्व 269.78 हेक्टेयर क्षेत्रफल का, जो वन क्षेत्रफल था, वही अब भी कागजों में दर्ज है। कारण यह कि छोटे-छोटे जो वन क्षेत्र हैं, वे वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हैं।
नतीजा यह है कि उनका संरक्षण ढंग से नहीं हो पा रहा है। इसी का फायदा लकड़ी माफिया व आरा मशीन संचालक उठा रहे हैं। अहिरौली, टांडा, अकबरपुर, जैतपुर व राजेसुल्तानपुर आदि क्षेत्रों में कई वन क्षेत्र लकड़ी माफियाओं के शिकार हो चुके हैं।