जलालपुर(अंबेडकरनगर)। जैतपुर के तमसा नदी तट स्थित बाबा जगदेव मंदिर में श्रीराम कथा के छठवें दिन रविवार को राम वन गमन प्रसंग का वर्णन किया गया। प्रवाचक साध्वी राधिका किशोरी ने बताया कि राजा दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम के राजतिलक की तैयारी में जुटे थे। गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन में राजाभिषेक की सभी व्यवस्थाएं की जा रही थीं।
अयोध्या में उत्सव का वातावरण था। इसी समय महल के भीतर घटनाक्रम ने अचानक मोड़ लिया। दासी मंथरा के प्रभाव में आकर महारानी कैकेयी के मन में शंका और असंतोष उत्पन्न हुआ। कैकेयी ने राजा दशरथ को पूर्व में दिए गए दो वरदानों की याद दिलाई और उनके बदले श्रीराम को 14 वर्ष के वनवास और भरत को अयोध्या का राजा बनाने की मांग रखी। प्रभु श्रीराम ने पिता की आज्ञा को सर्वोच्च मानते हुए वनगमन को स्वीकार किया। श्रीराम ने कहा कि पिता का वचन उनके लिए धर्म से भी ऊपर है। यह प्रसंग सिखाता है कि वचन पालन जीवन का मूल धर्म है। कर्तव्य के पालन के लिए व्यक्तिगत सुख का त्याग आवश्यक होता है। पारिवारिक संबंधों में मर्यादा और अनुशासन समाज को दिशा देते हैं। इस दौरान अरविंद, राजकुमार, जयप्रकाश, संतोष व अन्य उपस्थित रहे।