औपचारिकता निभाने के लिए एक-दो बार छापेमारी कर मिलावट के संदेह में नमूना लिया गया, लेकिन सारी कार्रवाई महज जांच तक ही सीमित रही। भोजन के गुणवत्ता पूर्ण न होने की शिकायतें भी होती हैं, लेकिन कभी इस तरफ कोई कदम नहीं उठाया जाता। इसका खामियाजा संबंधित विद्यालयों में अध्यनरत छात्र छात्राओं को भुगतना पड़ रहा है।
छात्र छात्राओं के स्वास्थ्य पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसके लिए शासन ने स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले मिड डे मील की गुणवत्ता जांच के निर्देश दिए थे। इसके तहत मध्याह्न भोजन योजना में प्रयुक्त होने वाली सामग्री के नमूने भर कर उसकी जांच कराए जानी है।
तमाम दिशा निर्देशों के बावजूद खाद्य संरक्षण एवं औषधि प्रशासन द्वारा इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। खाद्य सामग्रियों के नमूने लिए जाने की बात दूर भोजन की गुणवत्ता जानने के लिए विद्यालयों का औचक निरीक्षण करने के लिए कोई बड़ा अभियान भी नहीं चल सका। बताते चलें कि योजना के तहत जिले में कुल 2 हजार 22 विद्यालयों में अध्यनरत छात्र छात्राओं को दोपहर का भोजन दिया जा रहा है।
हालांकि खाद्य विभाग की तरफ मिड डे मील के तहत उपलब्ध कराए जा रहे भोजन की सामग्रियों की जांच को लेकर कुछ अलग ही दावा है। मुख्य खाद्य निरीक्षक वीके पांडेय ने बताया कि वर्ष 2015 में कुल विभिन्न विद्यालयों के औचक निरीक्षण में सब्जी, दाल, चावल, कढ़ी, मिर्च पाउडर, दूध आदि के कुल 67 नमूने लिए गए।
जांच के बाद चावल, मिर्च पाउडर व अरहर की दाल के तीन नमूने फेल पाए गए। इस पर संबंधित विद्यालयों पर कार्रवाई के लिए अधिकारियों को पत्र लिखा गया। इसी प्रकार वर्ष 2014 में विभिन्न विद्यालयों से खाद्य सामग्रियों के कुल 64 नमूने लिए गए। इनमें से सात नमूने फेल पाए गए। इसमें आटा के दो, चावल के दो व मिर्च पाउडर के तीन नमूने फेल पाए गए। इन विद्यालयों पर भी कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखा गया।