पिछले लगभग एक दशक से कुछ अधिक समय से पॉलीथिन बैग के प्रयोग में रिकार्ड तेजी आई है। दरअसल आमलोगों के लिए यह सामान्य तौर पर तो ज्यादा सुविधाजनक महसूस होता ही है भले ही बाद में इसके तमाम दुष्परिणाम लगातार सामने आ रहे हों।
पॉलीथिन का प्रयोग इतनी तेजी से बढ़ा है कि तमाम लोग अब घरों से सामान लेने के लिए निकलते समय झोले आदि का प्रयोग करना ही कम कर दिए हैं। दुकानों पर सहज ढंग से उपलब्ध होने वाली प्लास्टिक की थैली में ही सामान लेकर लोग अपने अपने घरों को लौटते हैं।
जाहिर तौर पर इसका प्रयोग बढ़ा है, तो पर्यावरण के लिए भी उतनी ही तेजी से खतरा उत्पन्न हुआ है। इसी का नतीजा है कि अब जिला मुख्यालय के साथ हीअन्य कस्बों तथा छोटी बड़ी बाजारों में इधर उधेर प्लास्टिक के बैग बड़ी तादाद मे ं फेंके हुए दिखाई पड़ जाते हैं।
यही प्लास्टिक बैग नाले नालियों में जाकर लगातार जलनिकासी का संकट खड़ा कर रहे हैं, तो वहीं खेतों में पहुंचकर भूमि का उपजाऊपन प्रभावित कर रहे हैं। अक्सर कूड़े के ढेर को जलाते समय इन प्लास्टिक की पन्नियों व बैग से निकलने वाले रासायनिक धूएं से मानव शरीर पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
पर्यावरण की बेहतरी भी इन धूओं से प्रभावित होती रहती है। मनुष्यों के साथ ही पशुओं के स्वास्थ्य पर भी इनका प्रतिकूल असर जब तब देखने को मिलता है। कारण यह कि घास या अन्य सामग्री के साथ जब पशु इन प्लास्टिक पन्नियों को भी खा जाते हैं, तो वह शरीर में जाकर कई तरह की गड़बड़ी खड़ी करते हैं।
इससे पशुओं की हालत कई बार बिगडने लगती है। इन्हीं सब परिस्थितियों के मद्देनजर उच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक के बाद भी शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में धड़ल्ले से प्लास्टिक की पन्नियों व थैले की बिक्री जारी है।