सरकार की प्राथमिकता में शुमार लोहिया समग्र ग्राम विकास से जुड़ी कई योजना के लिए समय पर धन नहीं मिल पा रहा है, तो वहीं अंबेडकर गांव व गांधी ग्राम जैसी योजनाओं का कोई पुरसाहाल नहीं है। अब ऐसे में एक नए नाम से सामने आ रही योजना को लेकर भी कहीं से ज्यादा उम्मीदें नजर नहीं आती।
स्मार्ट सिटी की तरह गांवों को विकसित करने के लिए केन्द्र सरकार ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी ग्रामीण मिशन योजना को मंजूरी दी है। इसके तहत गांवों को चयनित कर उनमें तेजी से विकास सुनिश्चित किए जाने हैं। निश्चिततौर पर यह योजना कागजों में जितनी अच्छी दिखाई देगी, वास्तविक धरातल पर उसके परिणाम उतने सुहाने नहीं होंगे।
कारण यह कि पहले से जो योजनाएं चल रही हैं, उनका वास्तविक हश्र लोगों के सामने है। गांवों का विकास तय करने के लिए मौजूदा सरकार ने वर्ष 2013-14 में 20 गांव चयनित किए थे। कागजों पर तो इन गांवों का पूर्ण विकास हो चुका है, लेकिन सच में ऐसा नहीं है।
सड़क व जल निकासी के अलावा शौचालय, पेयजल व आवास आदि क्षेत्रों में अभी भी तमाम पात्रों को सुविधाओं की दरकार बनी हुई है। वर्ष 2014-15 में 29 गांवों का चयन हुआ। इनमें से अब तक विभाग के ही मुताबिक लगभग 80 प्रतिशत काम हुए हैं।
वर्ष 2015-16 में चयनित 29 गांवों में विकास की हालत यह है कि कई योजनाओं में धन ही नहीं मिल पाया है। संपर्क मार्ग के लिए 17 करोड़ 89 लाख की जरूरत थी, लेकिन अब तक कोई रकम नहीं मिली है। आंगनबाड़ी केन्द्र के लिए 1 करोड़ 10 लाख, वैकल्पिक मार्ग प्रकाश के लिए 64 लाख, इन्दिरा आवास के लिए 4 करोड़ 18 लाख तथा लोहिया आवास के लिए 3 करोड़ 24 लाख की डिमांड है, लेकिन अब तक रकम नहीं पहुंच पायी है।
ऐसे में लोहिया गांवों को लेकर चल रहे विकास के दौर का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। इससे पहले गांधी ग्राम व अंबेडकर गांव की जो परिकल्पना थी, वह फिलहाल ठंडे बस्ते में है। जाहिर तौर पर ऐसे गांवों की सुध बीते कई वर्षों में नहीं ली जा सकी है। ग्रामीणों के मुताबिक जरूरत नई नई योजनाएं संचालित करने की नहीं, बल्कि पहले से चली आ रही रही योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करने की है।